For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

प्रथम अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल संगोष्ठी – इलाहाबाद जश्न-ए-ग़ज़ल 2015 -आयोजन रिपोर्ट

इलाहाबाद में पिछले दिनों, अक्तूबर 2015 के 10 से 12 तारीख के दरम्यान, ‘अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल अकादमी’ के तत्वावधान में अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद के सौजन्य से हिन्दुस्तानी अकादमी में ग़ज़ल विधा पर केन्द्रित तीन दिवसीय आयोजन ’जश्न-ए-ग़ज़ल’ सम्पन्न हुआ. ग़ज़ल विधा से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों, विभिन्न मंतव्यों तथा हिन्दी-उर्दू के साथ-साथ अन्य भाषाओं में लिखी जा रही ग़ज़लों के इतिहास, उनकी अवस्था एवं उनके स्वरूप पर विमर्श के लिए आहूत इस तरह का कोई आयोजन कई मायनों में अद्वितीय रहा. ज्ञातव्य है कि ग़ज़ल विधा को लेकर देश में इस तरह का कोई पहली बार प्रयास हो रहा था. ’अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल अकादमी’ में भारत के अलावा पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश तथा भूटान की साहित्यिक समितियाँ सहयोगी हैं जो विशेष रूप से ग़ज़ल विधा को लेकर अपने-अपने देश की भाषाओं में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही हैं. आयोजन में ग़ज़ल विधा के क्षेत्र में समालोचना तथा व्याकरण (अरूज़) के लिए देश के ख्याति प्राप्त राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वानों के अलावा नेपाल देश का चार सदस्यीय प्रतिनिधि-मण्डल भी सम्मिलित हुआ. कई अपरिहार्य कारणों से अन्य देशों का प्रतिनिधि-मण्डल अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं करा सका. ’अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल अकादमी’ की संस्थापना का उद्येश्य काव्य की एक विशिष्ट विधा ग़ज़ल को आवश्यक संरक्षण, संवर्धन एवं प्रोत्साहन देकर इसे सुप्रचारित करना एवं इस हेतु आवश्यक साहित्यिक माहौल बनाना है.

 

आयोजन का उद्घाटन मुख्य अतिथि उर्दू साहित्य के अंतरराष्ट्रीय स्तर के समालोचक एवं ग़ज़ल विधा के मर्मज्ञ पद्मश्री जनाब शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी के हाथों सम्पन्न हुआ. दीप-प्रज्ज्वलन में आयोजन के अध्यक्ष जनाब एम.ए. क़दीर तथा मुख्य अतिथि के साथ विशिष्ट अतिथि नेपाली भाषा के मूर्धन्य ग़ज़लकार श्री ज्ञानुवाकर पौडेल तथा श्री आवाज शर्मा थे. इस सत्र में अंजुमन प्रकाशन की अर्द्धवार्षिक पत्रिका ‘अंजुमन’ के साथ-साथ ‘ग़ज़ल की बाबत’ (श्री वीनस केसरी), जा-नशीं अकबर का हूँ मैं (जनाब फ़रमूद इलाहाबादी), ज़िन्दग़ी के साथ चल कर देखिये (जनाब शिज्जू शक़ूर), लफ्ज़ पत्थर हो गये (श्री राकेश दिलबर), मौसम के हवाले से (श्री सुरेश कुमार शेष) तथा साहिल पर सीपियाँ (श्रीमती राजेश कुमारी) पुस्तकों का लोकार्पण मुख्य अतिथि के कर कमलों से हुआ. ‘कहते हैं ग़ज़ल जिसको’ शीर्षक पर गहन वक्तव्य देते हुए जनाब शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी ने ग़ज़ल के विभिन्न पहलुओं तथा इसकी विशिष्टताओं से यह कहते हुए परिचय कराया कि ‘जिस भाषा में तुक का ख़ज़ाना होगा, तुकान्तता की परिपाटी होगी, उस भाषा में ग़ज़ल हो सकती है’. उन्होंने ग़ज़ल को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने तथा समझने पर बल दिया. इस सत्र का संचालन श्री यश मालवीय ने किया.

 

दूसरा सत्र जनाब फ़ाज़िल हाशमी के संचालन में प्रारम्भ हुआ. ’उर्दू ग़ज़लग़ोई’ पर जनाब एहतराम इस्लाम तथा डॉ. सुल्तान अहमद ने अपने वक्तव्य दिये. एहतराम साहब ने उर्दू ग़ज़ल के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए इस तथ्य पर ज़ोर दिया कि ग़ज़ल के कथ्य के लिए आज शायद ही कोई विषय अछूता है. हर तरह के कथ्य का शुमार शेर के माध्यम से ग़ज़लों में होता है. डॉ. सुल्तान अहमद ने ग़ज़लों में व्यंजना की संयमित आवश्यकता पर बल देते हुए, अन्यथा शाब्दिक कसरतों से ग़ज़लकारों को बचने की सलाह दी. दोनों विद्वानों ने नये ग़ज़लकारों के लिए ग़ज़ल के व्याकरण के प्रति दृढ़ और उत्तरदायी रहने की आवश्यकता को दुहराया.

 

तीसरे सत्र का संचालन अजामिल व्यास ने किया. यह सत्र मुख्य रूप से हिन्दी-उर्दू से इतर भाषाओं में हो रही ग़ज़लों पर संकेन्द्रित था. भोजपुरी भाषा में ग़ज़ल विधा के इतिहास एवं वर्तमान में वैधानिक स्थिति पर श्री सौरभ पाण्डेय ने अपना सारगर्भित पर्चा पढ़ा. नेपाली भाषा में ग़ज़ल के इतिहास तथा वर्तमान रूपरेखा पर श्री आवाज शर्मा ने विशद वक्तव्य दिया. पंजाबी भाषा में ग़ज़ल के इतिहास तथा इसके वर्तमान स्वरूप पर श्री योगराज प्रभाकर ने खुल कर प्रकाश डाला. ग़ज़ल विधा एवं इसके व्याकरण को लेकर इन भाषाओं में व्याप गयी अन्यमनस्कता तीनों ही वक्तव्यों का मूल थी. किन्तु, एक बात तीनों ही वक्तव्यों से उभर कर आयी कि इन तीनों ही भाषाओं में ग़ज़ल को लेकर नये-हस्ताक्षर कहीं अधिक सचेत तथा संवेदनशील हैं. 

 

पहले दिन की समाप्ति चौथे सत्र में नशिस्त के आयोजन से हुई जिसमें सभा में उपस्थित ग़ज़लकारों में से कुल 28 ग़ज़लकारों ने ग़ज़ल पाठ किया. इस नशिस्त के अध्यक्ष श्री योगराज प्रभाकर जी थे तथा संचालन श्री राणा प्रताप सिंह ने किया.

 

आयोजन का पहला दिन जिस संयमित उत्साह से सम्पन्न हुआ वह अभूतपूर्व था. मुख्य अतिथि जनाब फ़ारुक़ी ने प्रथम सत्र में जिस तन्मयता के साथ अपना बीज-वक्तव्य प्रस्तुत किया वह इलाहाबाद के विद्वद्जनों, विशेषकर ग़ज़ल के अरूज़ से वाक़िफ़ श्रोताओं के बीच सुखद चर्चा का विषय रहा. सत्र के सफल समापन पर श्री सौरभ पाण्डेय ने धन्यवाद एवं आभार प्रकट किया.

 

दूसरे दिन का प्रारम्भ संगम तथा आनन्द-भवन के भ्रमण से हुआ. अतिथियों के उत्साह से स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि आयोजकों द्वारा आयोजित यह पर्यटन कितना प्रभावी कदम रहा. 

प्रथम सत्र श्री यश मालवीय के संचालन में प्रारम्भ हुआ. इस सत्र में मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध इतिहासकार तथा वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. लालबहादुर वर्मा थे. डॉ. वर्मा ने ’हिन्दी भाषा में ग़ज़ल की अस्मिता का प्रश्न’ विषय पर ’ग़ज़ल साझा तहज़ीब की नुमाइश करती है’ कहते हुए अपने गहन विचार प्रस्तुत किये. श्री विजय लोहार ने ’हिन्दी ग़ज़ल की पन्थीयधारा’ विषय पर अपना शोधपत्र पढ़ा. हिन्दी भाषाभाषियों के बीच प्रचलित हो रहे ग़ज़ल-विन्यास पर जनाब एहतराम इस्लाम, डॉ. अमिताभ त्रिपाठी तथा श्री धीरेन्द्र शुक्ला ने अपने-अपने विचार रखे. जनाब एहतराम इस्लाम ने इस तथ्य पर ज़ोर दे कर कहा कि ग़ज़ल वस्तुतः ग़ज़ल ही है, चाहे जिस भाषा में कही जाये. डॉ. अमिताभ त्रिपाठी ने भाषायी तौर उर्दू और हिन्दी के लिए कहा कि शाब्दिक अन्तर के अलावा इन दोनों में भाषा-व्याकरण के विचार से कोई अन्तर नहीं है. अतः उर्दू तथा हिन्दी ग़ज़लों के बीच मुख्य अन्तर ’प्रवृति’ का है. श्री धीरेन्द्र शुक्ला ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में ग़ज़लकारों को ग़ज़ल की विधा और इसके मूल स्वरूप को स्पष्ट रूप से समझने पर ज़ोर दिया. मुख्य अतिथि डॉ. वर्मा ने प्रस्तुतीकरण में नैसर्गिक सोच को संतुष्ट करने का यह कहते हुए सुझाव दिया, कि, भाषा में दुराग्रह कत्तई आवश्यक नहीं है. अन्य तीनों विचारकों ने ग़ज़ल प्रयासों में अपनायी गयी भाषाओं में शुद्धता तथा स्पष्टता को बरतने को प्रमुख माना.

 

दूसरे सत्र का संचालन श्री नन्दल हितैषी ने किया. इस सत्र में मुख्य धारा से अलग विषयों पर चर्चा हुई. जहाँ डॉ. मो. आज़म ने मुशायरा के इतिहास पर ज्ञानवर्द्धक वक्तव्य दिया. वहीं जनाब फ़रमूद इलाहाबादी तथा डॉ. असीम पीरज़ादा ने हास्य-व्यंग्य प्रधान ग़ज़लों, जिन्हें ’हज़ल’ कहते हैं, के ऊपर समुचित रौशनी डाली. फ़रमूद इलाहाबादी ने अपने उद्बोधन में कहा कि ’सामाजिक विड़ंबनाओं के विरुद्ध आक्रोश का अतिरेक किसी संवेदनशील मनुष्य को व्यंग्यकार बना देता है’. डॉ. मो. आज़म ने अत्यंत प्रसिद्ध हो चले मुशायरों पर बोलते हुए कहा कि मुशायरों को ग़ज़ल-वाचन की परम्परा से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए. डॉ. आज़म के अनुसार मुशायरे का मूल स्वरूप ’कनिष्क’ के ज़माने से प्रचलित ’कवि-सम्मेलनों’ में है. इससे पूर्व डॉ. शहनवाज़ आलम ने ’ग़ज़ल के ग़ालिबतरीन मौजूआत’ विषय पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया.

 

दूसरे दिन की समाप्ति तीसरे सत्र में नशिस्त के आयोजन से हुई, जिसके अध्यक्ष श्री अजामिल व्यास थे तथा संचालन श्री श्लेष गौतम ने किया. कुल तीस ग़ज़लकरों ने अपनी ग़ज़लें प्रस्तुत कीं. आज के सत्रों के समापन पर श्री सौरभ पाण्डेय ने धन्यवाद एवं आभार प्रकट किया.

 

तीसरे दिन का प्रथम सत्र 6 ग़ज़ल-संग्रहों पर परिचर्चा का था. श्री दीपक रूहानी के संचालन तथा श्री अशोक कुमार सिंह एवं श्री विजय शंकर सिंह के आतिथ्य में दो ग़ज़ल संग्रहों ’मेरी मुट्ठी की रेत’ (श्री अशोक कुमार सिंह) तथा ’समरा’ (जनाब समर कबीर) का लोकार्पण हुआ. ग़ज़ल-संग्रहों पर परिचर्चा के क्रम में श्री यश मालवीय ने ’मेरी मुट्ठी की रेत (डॉ. अशोक कुमार सिंह) तथा ’लफ़्ज़ पत्थर हो गये (श्री राकेश दिलबर) पर अपने विचार रखे. डॉ. रविनन्दन सिंह ने ’ज़िन्दग़ी के साथ चलकर देखिये’ (जनाब शिज्जू शकूर) तथा ’जा-नशीं अकबर का हूँ मैं’ (जनाब फ़रमूद इलाहाबादी) ग़ज़ल-संग्रहों पर चर्चा की. श्री नन्दल हितैषी ने ’मौसम के हवाले से’ (श्री सुरेश कु. शेष) तथा ’साहिल पर सीपियाँ’ (श्रीमती राजेश कुमारी) पुस्तकों पर अपने विचार रखे. 

 

दूसरे सत्र में फ़रहत एहसास तथा डॉ. अहमद महफ़ूज़ ने ’ग़ज़ल और आलोचना’ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये. फ़रहत एहसास ने अपने सारगर्भित वक्तव्य के माध्यम से ग़ज़ल की बारीकियों की ओर श्रोताओं का ध्यान खींचा - ’इस सिम्फ़ में कोई जादू तो है. शाइर एक माहौल रचता है और अपने हिसाब से लफ़्ज़ चुन कर अपने ख़यालों को पन्नों पर उतार देता है.’ इस सत्र के संचालन का दायित्व भी श्री दीपक रूहानी पर था.

 

तीसरे सत्र में ’इल्मे अरूज़’ पर परिचर्चा हुई. जिसमें प्रो. अहमद महफ़ूज़, डॉ. सुल्तान अहमद तथा डॉ. मो. आज़म ने अपने विचार प्रस्तुत किये. सत्र का संचालन मारुफ़ रायबरेलवी ने किया. डॉ. अहमद महफ़ूज़ ने इस बात को विशेष तौरपर रेखांकित किया कि ग़ज़ल के व्याकरण को लेकर इस तरह का कोई आयोजन पहली बार सम्भव हो रहा है, जहाँ ग़ज़ल से सम्बन्धित लगभग हर विन्दु पर इतनी खुल कर चर्चा हुई है. डॉ. आज़म ने कहा कि अरूज़ और ग़ज़ल की भाषा को लेकर हुआ इतना गंभीर प्रयास हर तरह से श्लाघनीय है. डॉ. आज़म ने इस तरह के आयोजन-प्रयास के परिप्रेक्ष्य में ’उस्ताद-शाग़िर्द’ की परम्परा को आज के संदर्भ में पुनः संभव हुआ महसूस किया. तीसरे दिन का आयोजन चौथे सत्र की नशिस्त से सम्पन्न हुआ जिसमें लगभग तीस ग़ज़लकारों ने अपनी-अपनी ग़ज़लें प्रस्तुत कीं. नशिस्त की सदारत कर रहे जनाब फ़रहत अहसास की ग़ज़लों से श्रोता और विद्वद्जन अश-अश कर उठे. फ़रहत साहब रूह और जिस्म के अंतरसम्बन्धों के माध्यम से आज के संदर्भों को अपनी ग़ज़लों में सफलतापूर्वक रूपायित करते हैं. ग़ज़लकारों की मधुर प्रस्तुतियों की फुहारों से सुधी-श्रोता देर रात गये तर-ब-तर होते रहे.

 

तीन दिनों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर के माहौल में इस अत्यंत विशिष्ट आयोजन का क्रियान्वयन एवं संचालन स्पष्टतः विन्दुवत प्रयास की मांग करता था. अपने उद्येश्य में सफल तीन दिवसीय आयोजन ’जश्न-ए-ग़ज़ल’ को ग़ज़ल के अरूज़ और ग़ज़ल-समालोचना पर गंभीर परिचर्चा की परम्परा को प्रारम्भ करने का श्रेय तो जाता ही है, इस आयोजन का शुमार ग़ज़ल के इतिहास में एक विशिष्ट घटना के रूप में भी दर्ज़ होगा, इसमें शक़ नहीं है. संगोष्ठी में सम्मिलित सदस्यों व अतिथियों को प्रतीक चिन्ह व प्रमाण पत्र प्रदान किया गया. स्वादिष्ट भोजन तथा ट्रांसपोर्टेशन की सुव्यवस्था तथा अंजुमन प्रकाशन की पुस्तकों का उत्साहजनक विक्रय इस आयोजन की सफलता का एक अलग ही स्वरूप प्रस्तुत करता है. ’अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल अकादमी’ के तत्त्वाधान में सम्पन्न हुआ ग़ज़ल की विधा और शिल्प को ले कर यह गंभीर प्रयास आने वाले दिनों के लिए महती आशाएँ जगाता है. ग़ज़ल की विधा और इसके व्याकरण को ले कर हुए इस सद्प्रयास के लिए आयोजक अंजुमन प्रकाशन के प्रोपराईटर श्री वीनस केसरी तथा उनकी टीम को उपस्थित विद्वद्वक्ताओं तथा भारत के विभिन्न शहरों से आये सुधी-श्रोताओं ने मुखर बधाइयाँ तथा शुभकामनाएँ दीं. टीम के सभी सदस्यों को उनके तत्पर योगदान के लिए जनाब फ़रहत एहसास के हाथों विशेष तौर पर सम्मानित किया गया. 
***********************************************************
--सौरभ पाण्डेय 

 

Views: 679

Reply to This

Replies to This Discussion

आदरणीय सौरभ जी अपनी व्यस्तताओं के उपरान्त भी आपने आयोजन की रिपोर्ट मंच पर साथियो के लिए रखी बहुत बहुत आभार । तीन दिवसीय कार्यक्रम की सटीक रिपोर्ट आपके सूक्ष्म दर्शन और विश्लेषण की सूचक है । आभार आप का । हम भी एक सादस्य के रूप में वहाँ मौजूद थे । चूंकि आप भी आयोजन की एक समिति से जुड़े हुए थे इसलिए आपके माध्यम से आयोजन के हर सदस्य का यहाँ हम आभार व्यक्त करते है जिनके अथक श्रम और समर्पण ने इलाहबाद का तीन दिवसीय प्रवास सुखद और स्मरणीय बनाया । रिपोर्ट के इन चित्रों में वो कही नही हैं किन्तु वे नीव की ईंट रहे उन्हें हमारा आभार ।
इस आयोजन में मेजबानों की एक सदाशयता का ज़िक्र आप करना भूल गए की दुसरे दिन 11 अक्टूबर को उन्ही के प्रयासों से संगम स्नान नौका विहार और आनंद भवन के भ्रमण का भी लाभ सभी सदस्यों को मिला इस हेतु भी आभार । ओ बी ओ के कई साथियो और आप सभी से मिलना सुखद अनुभव रहा । धन्यवाद ।

आ. रवि शुक्लजी, आपने रपट के प्रस्तुतीकरण को अनुमोदित कर मान रखा। आभार।

कई विन्दुओं का स्मरण कराया आपने। चूँकि इस रपट का विशेष उपयोग भी होना है अतः कई विन्दु बलात नकारने पड़े हैं। यह अवश्य है कि अपने मंच पर प्रस्तुत करते समय उन विन्दुओं को शामिल कर लेना था। कर लूँगा। 

इधर मेरा लैपटॉप क्रैश कर गया है। मैं मोबाइल से जो थोड़ा बहुत काम कर लेता हुँ। ओबीओ के एडिट बॉक्स में टाइप करते समय वर्चुअल की बोर्ड कई बार नहीं दिखता। इसीकारण मंच से भी बलात दूर हूँ। आप सभी माफ़ करेंगे।

माफी जैसे शब्‍द प्रयोग करके स्‍नेह को बोझिल न करें आदरणीय मोबाईल पर उपयोग की कठिनाई हम समझ सकते है हमने भी बस आपके साथ और मंच के साथ विचार साझा किये है । सादर

मुझे भी जश्न-ए-ग़ज़ल के तीसरे और चौथे सत्र में शमूलियत का शरफ हासिल हुआ. इलाहाबाद पहुँचते ही जिस प्रकार इस अकिंचन का स्वागत हुआ, वह अविस्मर्णीय है I भाई राणा प्रताप सिंह का मुझे स्टेशन पर लेने आना, आयोजन स्थल पर आ० सौरभ पाण्डेय जी, भाई वीनस केसरी जी, जान गोरखपुरी जी, शिज्जू शकूर जी, शुभ्रान्शु पाण्डेय जी, वैद्यनाथ सारथी जी का उड़कर गले मिलना आज भी द्रवित कर जाता है। ओबीओ के वरिष्ठ सदस्यों आ० गिरिराज भंडारी जी, रवि शुक्ला जी , केवल प्रसाद सत्यम जी सरस दरबारी जी, मोहन बेगोवाल जी एवं राजेश कुमारी जी से मिलना भी रोमांचकारी अनुभव रहाI खुले स्वाभाव वाले और हास्य ग़ज़ल के सुलतान आ० फरमूद इलाहाबादी जी अन्दर तक इलाहाबादी अमरुद की तरह मीठे लगे I मोहतरम एहतराम इस्लाम साहिब जिनसे मिलने और जिन्हें सुनने की तमन्ना एक अरसे से दिल में थी, उनसे मिलकर दिल को सुकून मिला I सादगी की मूरत और मृदुभाषी एहतराम इस्लाम साहिब का सानिध्य पाकर मेरा वर्षों पुराना सपना साकार हुआ। नेपाली मित्र भाई आवाज शर्मा जी से सोशल मीडिया के ज़रिये बहुत पुराना परिचय है, किन्तु इलाहबाद में उनसे रू-ब-रू होना एक यादगार अनुभव रहा I

हिंदी-उर्दू बाहुल्य रचनकारों के बीच पंजाबी ग़ज़ल पर बात करने को लेकर मैं थोडा डरा हुआ था. किन्तु पंजाबी ग़ज़ल के बारे में मेरे खोज-पत्र को वहां विद्वान् श्रोतायों ने बड़े संयम और सब्र से सुना, थोड़े थोड़े अंतराल के बाद उनकी तालियों और उनकी मुक्तकंठ प्रशंसा ने दिल जीत लिया। मुशायरे की सदारत का मौका देकर वहां मुझे  जो सम्मान दिया गया, उसे मैं कभी नहीं भुला पाऊँगा।

भाई राणा प्रताप सिंह जी, डॉ मोहम्मद आज़म साहिब तथा डॉ सुलतान अहमद जी के साथ संगम की नाव यात्रा, अकबर के किले की सैर, अक्षय पीपल के दर्शन, आनन्द भवन का भ्रमण और महान क्रांतिकारी शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत वाली जगह की यात्रा जीवन भर नहीं भूल पायेगी। समय कम था अत: मैं केवल दो सत्रों का ही हिस्सा बन पाया जिसका मुझे अफ़सोस रहेगा।

आदरणीय सौरभ सर, तीन दिवसीय आयोजन ’जश्न-ए-ग़ज़ल’ निसंदेह अपनेआप में विशिष्ट और अनूठा आयोजन था. इस आयोजन में मैं कतिपय कारणों से सम्मिलित नहीं हो पाया इसका मलाल तो है मगर आयोजन की सफलता और ग़ज़ल के क्षेत्र में उठे इस बड़े कदम को देखकर मन अभिभूत है. आपने इस आयोजन की रिपोर्ट प्रस्तुत कर,  आयोजन से शेष को भी जोड़ दिया है. इस आयोजन में सम्मिलित होना एक सौभाग्य ही था जिससे मैं वंचित रह गया. इसका हमेशा खेद रहेगा.  आयोजन की सफलता के लिए आयोजक मंडल और सहभागियों को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें. सादर 

आदरणीय मिथिलेश भाई, आयोजन की क़ामयाबी का प्रमुख कारण निस्संदेह आप जैसे लोगों की दुआ और शुभकामनाएँ ही हैं. हम तीन दिनों तक जिस संसार में थे वह ग़ज़ल ग़ज़ल और बस ग़ज़ल की थी. ग़ज़ल की बातें, ग़ज़ल पर बातें, ग़ज़ल में बातें, ग़ज़ल से होती बातें ! आपकी उपस्थिति की प्रतीक्षा थी. आने वाले दिनों में ऐसे या इससे जुड़े कई और आयोजन होंगे. इस प्रारम्भ को जैसा प्रतिकार मिला है वह आश्वस्त करता है. शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद

आदरणीय सौरभ सर, गज़लों के संसार में गजलों को जीना वाकई अद्भुत अनुभव रहा होगा. आनेवाले दिनों में होने वाले आयोजन में अवश्य सम्मिलित होऊंगा. सादर 

एक अरसे से ग़ज़ल मेरी प्रिय विधा है . और जो भी सीखा इसी मंच की देन और यहाँ के जानकर साथियों का स्नेह और उनकी प्रेरणा से ही सीखा जाना है . यात्रा और सहयोग यथावत है .आदरणीय अग्रज श्री की समग्र -प्रभावी रपट पढ़कर आयोजन में शामिल न हो पाने का दुःख और बढ़ गया है . श्री वीनस जी और उनकी समर्पित टीम ने आयोजन को सफल और यादगार ही नहीं बनाया , बल्कि ग़ज़ल के लिए एक मील का पत्थर सिद्ध किया है .आप सबका यह योगदान बाद मुद्दत तक याद किया और सराहा जाएगा . अभिवादन और आभार !!

आदरणीय अभिनव अरुणजी, 

अपने रिपोर्ताज़ पर आपकी टिप्पणी से मन प्रसन्न है.  सही कहिये तो उक्त आयोजन में आपकी उपस्थिति की शत प्रतिशत आश्वस्ति थी. प्रतीत होता है कि आप आजकल बहुत ही व्यस्त चल रहे हैं तभी इस निराले मंच पर आपकी दैनिक उपस्थिति भी बाधित हो गयी है. आप जैसे पाठक-रचनाकारों की उत्कट प्रतीक्षा बनी रहती है. कारण कि सुधी पाठक ही अन्यान्य रचनाकारों के लिए दिशा निर्देशक का कार्य करते हैं. 

शुभेच्छाएँ 

आदरणीय सौरभ सर प्रथम अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल संगोष्ठी का जीवन्त वर्णन आपके माध्यम से पढ़ने और जानने को मिला । आयोजन की सफलता पर हार्दिक बधाई । निसंदेह इस तरह के आयोजन साहित्य की हर विधा में उपयोगी एवं ज्ञान वर्धक साबित होंगे ।

सादर। ....

रिपोर्ट पर अपने मंतव्य के साथ आने केलिए हार्दिक धन्यवाद, नादिर भाई. 

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

अजय गुप्ता commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए
"भाई मनोज जी, सबसे पहले तो अच्छी ग़ज़ल और अलग अंदाज़ अशार के लिए बधाई. अब आपकी ग़ज़ल पर आते है. ///वेदना…"
2 hours ago
Muzammil shah is now a member of Open Books Online
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on TEJ VEER SINGH's blog post कुंठा - लघुकथा -
"आ. भाई तेजवीर जी, बेहतरीन कथा हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
2 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post कुंठा - लघुकथा -
"हार्दिक आभार आदरणीय राज नवादवी जी।"
4 hours ago
PHOOL SINGH posted a blog post

जीवन संगिनी

हार हार का टूट चुका जबतुमसे ही आश बाँधी हैमैं नहीं तो तुम सहीसमर्थ जीवन की ठानी है|| मजबूर नहीं…See More
4 hours ago
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post "बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ"
"जनाब सुरेन्द्र इंसान जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ।"
5 hours ago
PHOOL SINGH updated their profile
5 hours ago
surender insan commented on Samar kabeer's blog post "बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ"
"मोहतरम समर साहब आदाब।वाह जी वाह बेहतरीन ग़ज़ल जी। मतले से मकते तक हर शेर लाजवाब।बहुत बहुत दिली…"
7 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

रंगहीन ख़ुतूत ...

रंगहीन ख़ुतूत ...तन्हाई रात की दहलीज़ पर देर तक रुकी रही चाँद दस्तक देता रहा मन उलझा रहा किसका दामन…See More
7 hours ago
राज़ नवादवी commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post अख़बारों की बातें छोड़ो कोई ग़ज़ल कहो (ग़ज़ल)
"आदरणीय धर्मेंद्र कुमार जी, आदाब, सुंदर गजल हुयी है, हार्दिक बधाई. सादर. "
8 hours ago
राज़ नवादवी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी. सुन्दर गज़ल. सादर. "
8 hours ago
राज़ नवादवी commented on TEJ VEER SINGH's blog post कुंठा - लघुकथा -
"आदरणीय तेज वीर सिंह साहब, बड़े घटनाक्रम वाली एक लघु कथा. बाल एवं अपराध मनोविज्ञान को सफलता पूर्वक…"
8 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service