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"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-86 (विषय: समर्पण)

आदरणीय साथियो,

सादर नमन।
.
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-86 में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। इस बार का विषय है 'समर्पण'। तो आइए इस विषय के किसी भी पहलू को कलमबंद करके एक प्रभावोत्पादक लघुकथा रचकर इस गोष्ठी को सफल बनाएँ।  
:  
"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-86
"विषय: 'समर्पण'
अवधि : 30-05-2022  से 31-05-2022 
.
अति आवश्यक सूचना:-
1. सदस्यगण आयोजन अवधि के दौरान अपनी केवल एक लघुकथा पोस्ट कर सकते हैं।
2. रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना/ टिप्पणियाँ केवल देवनागरी फॉण्ट में टाइप कर, लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड/नॉन इटेलिक टेक्स्ट में ही पोस्ट करें।
3. टिप्पणियाँ केवल "रनिंग टेक्स्ट" में ही लिखें, १०-१५ शब्द की टिप्पणी को ३-४ पंक्तियों में विभक्त न करें। ऐसा करने से आयोजन के पन्नों की संख्या अनावश्यक रूप में बढ़ जाती है तथा "पेज जम्पिंग" की समस्या आ जाती है। 
4. एक-दो शब्द की चलताऊ टिप्पणी देने से गुरेज़ करें। ऐसी हल्की टिप्पणी मंच और रचनाकार का अपमान मानी जाती है।आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है, किन्तु बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता आपेक्षित है। देखा गया कि कई साथी अपनी रचना पोस्ट करने के बाद गायब हो जाते हैं, या केवल अपनी रचना के आस पास ही मंडराते रहते हैंI कुछेक साथी दूसरों की रचना पर टिप्पणी करना तो दूर वे अपनी रचना पर आई टिप्पणियों तक की पावती देने तक से गुरेज़ करते हैंI ऐसा रवैया कतई ठीक नहींI यह रचनाकार के साथ साथ टिप्पणीकर्ता का भी अपमान हैI
5. नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति तथा गलत थ्रेड में पोस्ट हुई रचना/टिप्पणी को बिना कोई कारण बताये हटाया जा सकता है। यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
6. रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका, अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल/स्माइली आदि लिखने/लगाने की आवश्यकता नहीं है।
7. प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार "मौलिक व अप्रकाशित" अवश्य लिखें।
8. आयोजन से दौरान रचना में संशोधन हेतु कोई अनुरोध स्वीकार्य न होगा। रचनाओं का संकलन आने के बाद ही संशोधन हेतु अनुरोध करें। 
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मंच संचालक
योगराज प्रभाकर
(प्रधान संपादक)
ओपनबुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम

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मेरी रचना पर आपकी राय/प्रतिक्रिया का इंतज़ार है।

आदरणीय मनन कुमार सिंह जी बहुत ख़ूब ‌‌‌‌‌‌‌‌बादलने बढ़िया व विचारणीय प्रश्न किए। बधाई। 

आभार आ.रचना जी।

समझौता या समर्पण 

"आखिर कब तक उसके आगे झुकती रहोगी? तुम्हारी लाई कोई भी चीज उसे पसंद नहीं आती?उसके एक इशारे पर उस चीज को बदलवा आती हो ?क्या तुम्हारा दिल नहीं करता अपनी मर्जी चलाने का? इतना समझौता क्यों, किसलिए ?उसे छोड़ना तुम्हारे लिए इतना मुश्किल क्यों है?आफिस से लौटते हुए सुनयना ने भावना को लगभग डाँटते हुए कहा।

बहुत देर से चुपचाप सुनती भावना आखिर बोल पड़ी "नहीं, उसे छोड़ना मेरे लिए मुश्किल नहीं है मुश्किल तो है लोगों की तरस खाती निगाहें देखना, बच्चों को बिन बाप की औलाद कहकर बेचारा समझना। और..जिसे तुम समझौता या झुकना समझ रही हो न..वह मेरी ममता के प्रति  समर्पण है।"

मौलिक व अप्रकाशित

वाह। ममता का समर्पण! ममता के प्रति समर्पण (समझौता नहीं)। प्रदत्त विषयांतर्गत बढ़िया मार्मिक लघुकथा। हार्दिक बधाई मुहतरमा रचना भाटिया साहिबा। शीर्षक सामान्य न रखकर कोई नया सोचा जा सकता है। यह समस्या बिन बाप की संतान के साथ ही नहीं तलाक़ की कगार वाले रिश्तों और तलाक पा चुकी माँ और  पीड़ित संतान के साथ भी है। माँ बाप.के बीच पिसती संतान के.साथ भी है। ममता का समर्पण कहें या समझौता भी कहें। संतान की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी। यही समर्पण की मंज़िल है। शीर्षक में कोई बिम्ब या प्रतीक लीजिएगा।

लेखनी व गोष्ठी के प्रति  समयनिष्ठ होकर इस तरह यह गोष्ठी भी सफल रही। सभी सहभागियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। शुभ रात्रि।

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