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22 22 22 22
केले की है महिमा,भाई
उसकी होती देख बड़ाई।1

कच्चा, सब्जी में आ जाता
पक जाये फिर गटको भाई।2

छिलके दूर कहीं रखना जी,
पाँव पड़ें, तो राम दुहाई।3

कब्ज हरेगा, रक्त बढ़ेगा,
लौह करेगा तन, हरषाई।4

बाबाजी ने गज्ल बनायी
गाते चलते महिमा भाई।5

नाम न आने पर देखा है
सोमूजी रहते छड़िआई।6

बाल बचे जो,वे लहरायें,
छतरी ओढ़े टकलू नाई।7
@मौलिक व अप्रकाशित

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केले की महिमा को केले की विशेषताओं के इर्द-ग़िर्द ही रहने देना था. रचना सुन्दर बन पड़ी है. लेकिन ग़ज़ल कहने और तदनुरूप बरतने के फेर में कथ्य के लिहाज़ से प्रस्तुति नियत नहीं रह पायी है. जबकि बाल-रचनाओं के लिए ऐसा होना आवश्यक हुआ करता है. ऐसा ही होना ही चाहिए. और विधा चाहे ग़ज़ल की ही हो, विधा का नाम दे देने बाल-रचनाओं में अनावश्यक गंभीरता आ जाती है. जबकि इन रचनाओं का उद्येश्य बच्चे हुआ करते हैं. वैसे रचना के तौर पर यह प्रस्तुति मनभावन बन पड़ी है. इसके लिए दाद तो बनती ही है.

हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार करें, आदरणीय मनन जी. 

आदरणीय सौरभ जी,स्नेहिल सुझाओं से कृतार्थ हूँ।आपकी प्रेरणा मेरे लिए अमूल्य है।रही बात गजल और नाम वगैरह की,तो यह रचना महिमा(पोती)की फरमाईश का नतीजा है।अतः,रचना के क्रम में स्वतः ही ये सब घटित हुए हैं,अलग सेकोई आयास नहीं किया गया है,सादर।पुनश्च, बहुत बहुत आभारी हूँ।

आदरणीय मेरे कहे का तात्पर्य यह है कि इस रचना की विधा अवश्य ग़ज़ल विन्यास पर आधारित है. लेकिन शीर्षक ’केलेकी महिमा’ होने से इस रचना को शीर्षक तक केन्द्रित रखना श्रेयस्कर था. साथ ही, शीर्षक में ग़ज़ल आदि लिखने की कोई सार्थक आवश्यकता महसूस नहीं होती. 

वैसे इसमें संदेह नहीं है, कि आपकी यह रचना बाल-मनोविज्ञान को संतुष्ट कर पाने में सक्षम है. 

जी आदरणीय, आपकी भावनाओं से अभिभूत हूँ।
पाँच बसंतों की महिमा मेरी गजलें सुनकर याद कर लेती हैं,मुझे सुनाती भी हैं।

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