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अनूठा जन्मदिन
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पाखी आज बहुत खुश थी । स्कूल से आई और बैग एक ओर पटककर सीधे रसोई में जाकर चिल्लाई - " माँ ... माँ ..."
" क्या हुआ , इतनी क्यों चहक रही है ? माँ ने मुस्कुराते हुए पूछा ।
" माँ , आज मेरी कक्षा के एक मित्र विभु का जन्मदिन है , और उसने हमारी कक्षा के सभी मित्रों को घर पर पार्टी में बुलाया है ।"
" ओह ! तो ये खुशी जन्मदिन की पार्टी की है । " माँ ने गाल पर हलकी सी चपत लगाते हुए कहा ।
" हाँ माँ ..." कहते हुए वह माँ से लिपट गई ।
" अच्छा बाबा अच्छा... चली जाना , पर पहले 'यूनिफार्म' बदलकर हाथ-मुँह तो धोकर आ ... तब तक मैं तेरे लिए खाना लगा देती हूँ । "
" ठीक है माँ ..."
भोजन करने के बाद पाखी बिस्तर पर थोड़ा आराम करने को लेटी तो पार्टी में जाने की खुशी में नींद भी नहीं आ रही थी ।उसकी नज़रें सामने दीवार पर टँगी घड़ी पर ही टिकी हुई थीं कि कब पाँच बजे और वह तैयार होकर अपने मित्र के घर पार्टी में जाये , केक खाये और ख़ूब नाचे । सोचते-सोचते आखिर पाखी को नींद आ ही गई ।
" पाखी... ओ पाखी ... सोती रहेगी क्या ? दोस्त की पार्टी में नहीं जाना तुझे ? " माँ पाखी को हिलाते हुए बोलीं ।
" पार्टी शब्द सुनते ही पाखी जल्दी से उठ बैठी । आँखें मलते हुए बोली , " हाँ माँ , मैं बस अभी तैयार होती हूँ । "
" पाखी माँ के सामने तैयार होकर आई तो माँ ने उसके गाल पर प्यार करते हुए कहा , " बड़ी सुंदर लग रही है मेरी बेटी , नज़र न लगे किसी की । जा बाहर तेरा भाई गाड़ी 'स्टार्ट' कर कब से इंतज़ार कर रहा है । और सुन ... समय से आ जाना । ज़्यादा देर मत करना । "
" ठीक है माँ ..." वह दौड़कर बाहर निकल गई । मित्र का घर उसके घर से बहुत अधिक दूर नहीं था । वे पाँच मिनिट में ही पहुँच गए ।
विभु के सभी मित्र आ चुके थे । पाखी ने एक नज़र पूरे कमरे में दौड़ाई , ये देखने के लिए कि उसके मित्र ने अपना जन्मदिन मनाने वाला कमरा किस तरह सजाया है , परन्तु वह देखकर आश्चर्यचकित हो गई कि किसी भी दीवार पर न तो बैलून टँगे थे और न ही रंगीन झालरें । जैसे कि सभी जन्मदिन पार्टी में होता है । इसकी जगह दीवारों पर हरे-भरे पेड़-पौधों के चित्र लगे हुए थे । जीव-जंतुओं के चित्रों की कटिंग काटकर चिपकाई गई थी । कुछ पोस्टर भी थे जिन पर हाथ से रंगीन अक्षरों में कुछ सन्देश लिखे हुए थे । पाखी ने एक-एक कर संदेशों को पढ़ना शुरू किया -
" हमने अब यह ठाना है , जीवों को बचाना है ।"
" जंतुओं की जब करोगे रक्षा , तभी होगी पर्यावरण की सुरक्षा । "
" प्रकृति की रक्षा है देश की रक्षा । "
" धरती माँ का करो सम्मान , यह है हमारी जान । "
पाखी से रहा न गया तो वह विभु के पास जाकर पूछ बैठी , " आज तो तुम्हारा जन्मदिन है न , फिर तुमने घर को बैलून , सितारों से क्यों नहीं सजाया ? "
" पाखी , पहले ये बताओ , क्या तुम्हें ये सजावट अच्छी नहीं लगी ?"
" हाँ , लगी तो ... परन्तु जन्मदिन पर भी कोई ऐसे घर को सजाता है ? "
" हा हा हा ... तुम्हारे आने से पहले ये सभी दोस्त भी यही प्रश्न कर रहे थे । अच्छा पाखी ये बताओ , परसों हमारी हिन्दी की अध्यापिका ने कक्षा में क्या समझाया था ? "
" क्या समझाया था ? "
" यही न कि पेड़ कटते जा रहे हैं , जिससे बारिश होना कम हो गई है । जंगल न रहने से जीव-जंतुओं जैसे शेर , चीता , हिरण आदि को रहने के लिए घर नहीं मिलता है , इसलिए कभी-कभी वे भटकते हुए शहर में भी आ जाते हैं । "
" हाँ याद आया । ये भी कहा था , अगर हमने अभी भी प्रकृति को बचाना शुरू नहीं किया तो बढ़ते प्रदूषण के कारण मनुष्य का जीवित रहना भी मुश्किल हो जाएगा । "
" हाँ तो अब समझ गई न , मैंने ये सब क्यों किया ? "
" हम्म... बहुत अच्छे से , परन्तु अभी भी एक बात समझ नहीं आई । इस तरह तुम क्या दिखाना चाहते हो ? "
" पाखी , मैं सबको सन्देश देना चाहता हूँ बस और कुछ नहीं। आज मेरी कक्षा के मित्रों के अलावा और भी मित्र आये हैं , रिश्तेदार आये हैं । वे सब इसे देखेंगे , पढ़ेंगे तो उनके भीतर से आवाज़ जरूर आएगी कि एक पेड़ लगाना इतना भी मुश्किल नहीं । यदि सब इससे प्रेरणा लेकर एक-एक पेड़ भी लगायेंगे तो फिर इस धरती को हरा-भरा होने से कोई न रोक पायेगा । "
" हूँ... बिल्कुल सही कहा विभु । अभी बारिश का मौसम है । मेरी माँ कहती है कि पौधे लगाने का यह सही समय है । मैंने सोच लिया है , अब मैं भी एक पेड़ अवश्य लगाऊँगी । "
" हम भी लगायेंगे , हम भी लगायेंगे ... "सभी मित्रों का एक साथ स्वर गूँजा । फिर सबने तालियाँ बजा-बजाकर अपनी सहमति दी ।
" मुझे पता था मेरे सभी मित्र मेरी सोच में मेरा साथ देंगे , इसीलिए मैंने 'रिटर्न गिफ़्ट' के लिए पहले ही ढेर सारे पौधे खरीद लिए हैं ।" विभु ने एक कोने में रखे पौधों की ओर इशारा करते हुए कहा ।
" अरे वाह ! " सबने खुशी से जोरदार तालियाँ बजाई ।
" अरे विभु ! बातें ही करते रहोगे कि केक भी काटोगे ? " माँ ने हँसते हुए कहा ।
" हाँ माँ , क्यों नही । "
विभु केक काट रहा था और उसके मित्र इस अनूठे जन्मदिन पर अपने मित्र और मित्रता पर गर्व करते हुए तालियाँ बजाते हुए गा रहे थे , " बार-बार ये दिन आये ... बार-बार ये दिल गाये ... तुम जियो हज़ारों साल ... ये मेरी है आरज़ू ..."
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मौलिक , स्वरचित एवम अप्रकाशित

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