For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

पुस्तक का नाम.......''सच का परचम''........गजलों का संकलन।
गजलकार.........श्री अरूण कुमार पाण्डेय अभिनव अरूण
सम्पर्क......मो0.....09415678748
पुस्तक का मूल्य......रू0 20.00 मात्र पृष्ठ -112
प्रकाशक......अंजुमन प्रकाशन, 942 आर्य कन्या चौराहा मुठठीगंज, इलाहाबाद-211003 उ0प्र0

किसी भी पुस्तक की समीक्षा उसका गहन अध्ययन, मनन एवं समकालीन परिवेश के परिपेक्ष्य में सामाजिक सरोकारों, उपयोगिता आदि पर मीमांसा के फलस्वरूप विषयगत विचारों की कसौटी पर खरा उतारने का प्रयास होता है। किन्हीं परिस्थितियों में लेखक के साथ  व्‍यक्तिगत सम्बन्ध, लगाव को लेकर प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है, किन्तु समीक्षक सदैव ही सत्यनिष्ठ एवं तटस्थ होकर पुस्तक का विश्लेषण करता है।


वास्तविकता तो पाठक के हाथ में पुस्तक उपलब्धता से स्वत: प्रमाणित हो जाता है।  हां! यह अवश्य है कि किसी भी पुस्तक की समीक्षा पढ़ने के उपरान्त उसकी गंभीरता व उपयोगिता को समझना आसान हो जाता है। वास्तव में, यदि हम पुस्तक की समीक्षा को दरकिनार कर दे, तो भी इसका सद मूल्यांकन सर्वथा सच्चे पाठक द्वारा ही आंका जा सकता है। समीक्षक तो केवल पुस्तक के विभिन्न पहलुओं पर विस्त ृत विचारों एवं शैली आदि का संक्षेप में परिचय कराता है। गजल कहना और लिखना बहुत ही आसान है किन्तु उसके लालित्य, भाव, वज्न, काफिया, रदीफ, व व्याकरण आदि को उसके पृष्ठभूमि के आधार पर निभाना तथा इता व शुतुर्बा आदि विभिन्न दोषों पर नियंत्रण करना दीर्घकालीन शतत प्रयासों से ही साधा जा सकता है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण की बात है उन गजलों को पुस्तक के रूप में लाना जैसे कश्ती को सागर में चलाना तथा कोयले के पत्थर को तराश कर हीरा बनाने जैसा ही साहसिक कार्य है।


श्री अभिनव अरूण जी की गजलगोर्इ पुस्तक 'सच का परचम' को पढ़ने के उपरान्त उसके विभिन्न आवश्यक पहलुओं पर चर्चा कर रहा हूं। यधपि कि पुस्तक के पृष्ठ भाग पर उलिलखित है कि आप समकालीन प्रगतिशील गजल लेखन के सशक्त चर्चित हस्ताक्षर के साथ ही साथ साहित्य व आकाशवाणी के कार्यक्रमों में मंच संचालन तथा प्रस्तोता कमेंटेटर भी है।  इस लिहाज से भी गजलगोर्इ में इनकी भिज्ञता छिपार्इ नहीं जा सकती। आपने बेहद ही मृदु और नम्र भाव से सामाजिक मुददों को सशक्त रूप में पाठक के समक्ष रखा है। यहां एक बात अवश्य ही स्पष्ट करना चाहूंगा कि जब किसी भी लेखक की प्रथम कृति प्रकाशन की प्रकि्रया में होती है, तो वह अत्यधिक भावातिरेक में असहज हो जाता है। फलत: उससे कुछ ऐसी भूलें हो जाती हैं जिसकी वजह से एकाध शेर अथवा आंशिक दोष के कारण पूरी गजल अथवा सम्पूर्ण पुस्तक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और प्रश्न चिन्ह लग जाता है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। यह भी सही है कि मात्रा, पार्इ, शैलीगत दोष व्याकरण अथवा छपार्इ दोष आदि को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता है। अतएव पुस्तक के प्रकाशित होने के पूर्व ही गंभीरता से लिपि को पढ़ लिया जाना चाहिए क्योंकि पुस्तक प्रकाशित और लोकार्पण हो जाने के पश्चात उसे दुरूस्त किया जाना सम्भव नहीं होता है।


श्री अभिनव अरूण जी ने जिस तरह की गजल कही है, वह अत्यन्त सरल, सरस और हृदयग्राही हैं- जिसे सच का परचम कहना ही बेहतर है......।
अब किसी रूमाल में मिलती नहीं,
प्रेमिका के हाथ की तुरपाइयां।


गजलकारों की पंकित में स्वयं को स्थापित करते हुए बेझिझक कहते हैं......
''कहकहों में आप जब मशगूल थे,
बज्म में चुपचाप 'अभिनव आ गया।''


एक सशक्त गजलकार का यह दायित्व होता है कि वह समाज में फैले जटिलताओं को सहजता से बयां करे और ऐसा करने में आप सफल भी हुए है....
''छत से निकला आसमां पर छा गया,
वो धुआं था रोशनी को खा गया।


जन-जन के हृदय की असीम पीड़ा को उजागर करने में शेर प्रभावित करने में सक्षम भी हुर्इ है-
''अकेला सच का परचम हो रहा हूं,
मुकाबिल ये जमाना हो गया है।


आपने गजल की जमीनी तह और उसके नब्ज को बखूबी टटोल कर परखने में सफल भी हुए है-
मुहब्बत, हां कभी मुझको हुर्इ थी,
अभी तक जख्म को सहला रहा हूं।
मुहब्बत की जमीं मेरी नहीं पर,
गजल में गालिबन मीठा रहा हूं।


गजल की मिठास, आत्मीयत, समर्पण और बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना से ओत-प्रोत सकारात्मक आशानिवत दिशा में अर्ज करते है-
दो जहां की खुशी कमा लाया,
पांव मां के छुए दुआ लाया।


श्री अभिनव अरूण जी ने एक प्रगतिवादी, समसामयिक गजलकार के रूप में स्वयं को पाकर दृढ़ता से आवाहन करते हैं-
आसमां में सुराख होगा जरूर,
तीर तरकश से तो निकालिए।


एक सच्चे साहित्यकार होने के नाते ही समाज की तमाम विकृतियों को उजागर करते हुए उसका समाधान भी बड़ी सहजता से बताते हैं-
तंग गलियों में भी पहुंचेगी तरक्की की किरण,
पहले तो उन गलियों में हम आना-जाना सीख लें।


किसी भी विधा को परखने के लिए उस्तादों की वकालत करते हुए कहते है-
जाने कैसी किताब ले आए,
दोस्ती का हिसाब ले आए।


ओ0बी0ओ0 के आभासी दुनियां की पृष्ठ भूमि पर सकारात्मक साहितियक चर्चा को ध्यान में रखते हुए आप की यह धारणा बन गर्इ है कि जब तक किसी विषय, विधा और संस्कृति आदि पोस्ट पर सम्यक विचार विमर्श से उसकी उपोगिता न साबित हो, उसे अम्ल में लाना साहित्य की दृषिट में उचित नहीं है-
भला कैसे गजल होगी मुकम्मल,
सितम उसने अभी ढाया नहीं है।''


अन्त मे बस इतना कहूंगा कि- "सच का परचम" में उदघाटित अशआरों के माध्यम से श्री अभिनव अरूण की गजलों में कशिश है, शीरींपन है, सहजता और तेवर के साथ साथ ही पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट करने में भी सक्षम हैं। अत: आपका साहित्याकाश में सुदूर तक विचरण करने हेतु प्रथम पदार्पण है जो अबाध गति से लम्बा सफर तय करने में मील का पत्थर जैसा ही है। आपकी लेखनी व भावों कों मेरा शत-शत नमन है। इसी के साथ मैं आदरणीय श्री अभिनव अरूण जी को शुभकामनाओं सहित हार्दिक धन्यवाद व बधार्इ देता हूं और आशा करता हूं कि आपका यह सफर अबाध्य गति से निरन्तर चलता रहेगा।

शुभ-शुभ......।

Views: 549

Replies to This Discussion

ग़ज़ल संग्रह ’सच का परचम’ पर पाठक श्री केवल प्रसादजी की समीक्षा कई मायनों में उत्साह का कारण है.
किसी पुस्तक को पढ़ना एक बात है और उस पुस्तक की रचनाओं की विधा के सापेक्ष किसी तथ्य को दृढ़ता के साथ के साथ प्रस्तुत करना एकदम से दूसरी बात. यह दूसरी बात ही कई मानकों को संदर्भ बनाती है. कहना न होगा, एक समीक्षा-लेखक की दृष्टि से भाई केवल प्रसादजी ने बहुत मेहनत की है और एक लम्बी छलाँग लगायी है. इस बात के लिए भाई केवलजी वस्तुतः सराहना और बधाइयों के हकदार हैं. यह अवश्य है कि समीक्षा के कई विन्दुओं को समेटना अभी बाकी है. इनमें से व्याकरण की पकड़ के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता भी एक है. लेकिन आपकी समीक्षकीय प्रस्तुति अवश्य मान्य है और ग़ज़ल-संग्रह ’सच का परचम’ के भावी पाठकों के लिए मार्गदर्शक है.
शुभेच्छाएँ

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari posted a blog post

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें बेगुनाही और इन्साफ की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप अहिल्या बन…See More
22 hours ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
" मान्य,सौरभ पांडे जीआशीष यादव जी , , ह्रदय से आभारी हूँ. स्नेह बनाए रखियगा | सौरभ जी ने एक…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें
"आदरणीया अमिताजी, तार्किकता को शाब्दिक कर तटस्थ सवालों की तर्ज में बाँधा जाना प्रस्तुति को रुचिकर…"
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी प्रस्तुति निखर कर सामने आयी है. सभी शेर के कथ्य सशक्त हैं और बरबस…"
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय नीलेश भाई, आपका स्वागत है.     करेला हो अथवा नीम, लाख कड़वे सही, लेकिन रुधिर…"
Thursday
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय बाग़ी जी एवं कार्यकारिणी के सभी सदस्यगण !बहुत दुखद है कि स्थिथि बंद करने तक आ गयी है. आगे…"
Wednesday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
Tuesday
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
Monday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
Monday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service