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दरबार सजा भक्तो से माँ, दर्शन आस जगाऊ मै।
तेरे बिन माँ कौन सहारा, तुझमे आश्रय पाऊ मै।

डूब रही पतवार हमारी, माया के भवसागर में।
मोह पाश में जकड़ गया हूँ, कैसे पार लगाऊ मै।।

पाप धरा पर घेर लिया है, मन में है संताप भरा
देख जगत का दुःख माँ तेरे, फिर कैसे मुस्काऊ मै।।

है फैला घनघोर अधेरा, झट से अब तुम आओ माँ
तुम्ही हो खिवईया सबकी, तेरी महिमा गाऊ मै।।

बुद्धिहीन कर जोड़ खड़ा हूँ, चरण शरण की आस लिए
बालक हूँ नादान अभी मै, किस विधि तुझे मनाऊ मै।।

दृष्टि कृपा फैलाओ माता, दुष्टों का संहार करो
घूम रहे है राक्षस सारे, असहाय नजर आऊ मै।।

गोद हमेशा तेरे खेलूँ, मिलता रहे दरश तेरा
दास बनू तेरे चरणों का, भक्त 'नाथ' कहलाऊ मै।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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