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अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

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ये मानता हूँ पहले से बेकल रहा हूँ मैं,

लेकिन तेरे ख़्यालों का संदल रहा हूँ मैं।

अब होश की ज़मीन पर टिकते नहीं क़दम,

बरसों तुम्हारे प्यार में पागल रहा हूँ मैं।

हैरत से देखते हैं मुझे रास्ते के लोग,

बिल्कुल किनारे राह के यूँ चल रहा हूँ मैं।

मुझको उदासियां मिली है आसमान से,

चुपचाप इन के आसरे में जल रहा हूँ मैं।

साहिल पर जाके तू मुझे मुड़ कर तो देखता,

इक वक्त तेरी रूह की हलचल रहा हूँ…

Continue

Added by मनोज अहसास on January 28, 2021 at 11:35pm — 5 Comments

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