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Sushil Sarna's Blog – February 2026 Archive (6)

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस



बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।

कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।



घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज ।

जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।।



जिसको देखो घूस का, अजब लगा है रोग ।

घूसखोर समझे नहीं, पाप पंक के भोग ।।



बिना घूस होता नहीं, कोई भी हो काम ।

छोटे आते जाल में, बड़े रहें गुमनाम ।।



बाँछें खिलतीं मेज पर, जब भी  आता काम ।

बाबू भरता घूस से, अपने घर गोदाम ।।



खुलेआम अब घूस का,…

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Added by Sushil Sarna on February 18, 2026 at 8:00pm — 5 Comments

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यार

प्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।

आपस का विश्वास ही, इसका है आधार ।।

प्यार नाम समर्पण का, इसके अन्तर त्याग ।

इसकी सच्ची लाग का, है सच्चा  अनुराग ।।

प्यार ईश की वन्दना, प्यार जगत् का सार ।

प्यार दिखावे से परे, प्यार मौन शृंगार ।।

निहित नहीं है प्यार में, नफरत की दुर्गंध ।

इसके भावों में छुपे, प्रेम गीत के बंध ।।

प्यार रूह इसरार की, प्यार नहीं इंकार ।

गहरा होता प्यार में, प्यार भरा अभिसार…

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Added by Sushil Sarna on February 16, 2026 at 7:47pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 

अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध ।

मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।।

 

प्रेम लोक की कल्पना, जब होती साकार ।

काबू में कैसे रहे, मौन मिलन संसार ।।

 

अधरों की मनुहार का, अधर करें अनुवाद ।

शेष कपोलों पर रहे, वेगवान उन्माद ।।

 

अभिसारों की आँधियाँ, अधरों के उत्पात ।

कैसी बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।

 

बातें बीती रात की, कहते आए लाज ।

लाख छुपाया खुल गए, सुर्ख नयन से राज ।।

 

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 8, 2026 at 9:00pm — 3 Comments

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिल

रात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।

फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन ।।

उल्फत की दहलीज पर, दिल बैठा हैरान ।

सोच रहा वह  इश्क में, क्या पाया नादान ।।

आँसू आहें हिचकियाँ, उल्फत के ईनाम ।

नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।

ख्वाबों सा हर पल लगे, उन बांहों में यार ।

जिस्मानी जन्नत मिली, दिल को मिला करार ।।

कैसी ख्वाहिश कर रहा  , पागल दिल नादान ।

आसमान सम चाँद पर, खो बैठा ईमान ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 4, 2026 at 8:30pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . .नैन

दोहा सप्तक. . . . नैन

नैन द्वन्द्व में नैन ही, गए नैन से हार ।

नैनों को मीठी लगे, नैनों से तकरार ।।

नैनों की तकरार है, बड़ा अजब आनन्द ।

हृदय पृष्ठ पर प्रेम के,  अंकित होते छन्द ।।

नैनों के संवाद की, होती मोहक नाद ।

नैन सुने बस नैन के, अनबोले संवाद ।।

नैनों की होती सदा, मौन सुरों में बात ।

नैनों की मनुहार में, बीते सारी रात ।।

बड़ा मनोरम नैन का, होता है संसार ।

नैनों के इसरार को, नैन करें स्वीकार ।।

नैन उदधि में प्रेम का, जब…

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Added by Sushil Sarna on February 3, 2026 at 8:02pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

मिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।

निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।

लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।

वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।

पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में  संबंध ।

आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।

वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान ।

संबंधों को लीलती , धन की झूठी शान ।।

रिश्तों में माधुर्य का, वक्त गया है बीत ।

अब तो बस पहचान की ,निभा रहे हैं रीत ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 1, 2026 at 4:00pm — 2 Comments

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