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Amod shrivastav (bindouri)'s Blog – March 2016 Archive (6)

रोग जैसे लग रही है।

बह्र:-2122-2122-2122-212



क्या कहेगे लोग आखिर मेरी गजलें देखकर।

मैं किसानों की तरह ही खुश हुँ फसलें देखकर।।



जिनके घर छप्पर पड़े हैं आदमी क्या वो नहीं।

रो रहे है कुछ अमीराँ अपनी नस्लें देखकर।।



कांपते होठों से मेरे सुगबुगाती बात सा।

जैसे कोई लिख रहा हो आज शक्लें देख कर।।



कुछ न होगा वक्त की जुल्मी हवा की जीत से।

कुछ गरीबाँ ही रहेगे पिछली नक्लें देखकर।।



रोग जैसे लग रही है आज की यह सभ्यता।

काँपने लगती है रूहें भी मिसालें… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 31, 2016 at 1:11pm — 5 Comments

समय की मार से दो चार होंगे

1222/1222/122



समय की मार से दो चार होंगे।।

मेरे बच्चे तभी तैयार होंगे।।



मुहब्बत के खुले बाजार होंगे।

हमारे शेर तब अख़बार होंगे।।



न समझो दुश्मनों को काम जवानों।

नकाबों में छिपे ऐय्यार होंगे।।



जो मजहब की रही ऐसी ही हालत।

तो सच कहता हूँ हम बीमार होंगे।।



लगा की दीप रौशन कर मुहब्बत।

मेरा जुगनू सा सब परिवार होंगे।।



वो घूँघट में छिपा कर रुख मिले हैं।

लगा था इश्क में दीदार होंगे।।



जरा समझो हयाती इस… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 31, 2016 at 9:12am — 6 Comments

अमासी रात मेरे घर के तारे ..

बह्र:-1222-1222-1222-1222

अमासी रात मेरे घर के तारे छीन लेती है।।

तूफानी रात आये तो गुजारे छीन लेती है।।



मैं आँखें बन्द रखता हूँ मेरी यादें छुपा कर के।

खुला पाती है जब भी वो नज़ारे छीन लेती है।।



मेरी किस्मत को ऐ मालिक कभी उम्दा भी लिख्खा कर।

ये हसरत जिन्दगानी के सहारे छीन लेती है।।



नशा जिनको है दौलत का उन्हें कोई ये समझाए।

ये लत हमसे जरुरत में हमारे छीन लेती है।।



नहीं है हमजुबां कोई मेरा इस दौर हाजिर में।

कसक इतनी मेरे… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 27, 2016 at 3:58pm — 10 Comments

दो बह्र एक गजल ...

दो बहरी गजल:-

1बह्र:-2122-1122-1122-112

2बह्र:-2122-2122-2122-212



बेसबब रिश्ते -ओ-नातों के लिए बिफरे मिले।।

जब मिले मुझको मेरे सपने बहुत उलझे मिले।।



ज़िन्दगी जिनसे मिला सब ही बड़े नम से मिले।।

मैं उसे समझू मसीहा जो जरा हँस के मिले।।



रुक जरा पूछे इन्हे कैसी कठिन राहें रही।

ये मुसाफिर हैं पुराने आज हम जिनसे मिले।।



उस नदी का है समर्पण जो सदा बहती रहे।

राह जीवन की चले चलते हुए सब से मिले।।



जिंदगी जिनसे गुलाबी है… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 20, 2016 at 7:18am — 1 Comment

बिटिया को अपने अगर देखते हैं

बह्र- 122-122-122-122
बिटिया को अपनी अगर देखते है।।
खुदा का करम अपने घर देखते है।।

वो नीली परी है खिलौना है घर का।
उसे जब भी देखूँ समर देखते है।।

जो सज धज के बेटी की डोली उठी तो।
पड़ोसी भी भर के नजर देखते है।।

अभी तक पिता की दुआ का असर था।
ये बेटे तो अक्सर ही जर देखते है।।

वो पुरखों ने सींचा कभी प्यार से जो।
वही आज सूखा शजर देखते हैं।।

मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2016 at 9:32pm — 3 Comments

तुम्ही से ये सारा बसर देखते हैं

बहर 122/122/122/122

निगाहे नशा बेख़बर देखते है।
तुम्हे आज कल आँख भर देखते है।।

तुम्हारी अदा से जिधर देखते है।
मुहब्बत का अपने नगर देखते है।।

रूमानी है आबो हवा यार तेरी।
भरी बज्म में भी हुनर देखते है।।

जो सीखें हैं पेंचों के हमने करीने।
चलो आज उनका असर देखते है।।

तुम्ही गांव हो और* गालियाँ हमारी।।
तुम्ही से ये सारा बसर देखते है।।
मौलिक ,अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2016 at 9:28pm — 4 Comments

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