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समय की मार से दो चार होंगे

1222/1222/122

समय की मार से दो चार होंगे।।
मेरे बच्चे तभी तैयार होंगे।।

मुहब्बत के खुले बाजार होंगे।
हमारे शेर तब अख़बार होंगे।।

न समझो दुश्मनों को काम जवानों।
नकाबों में छिपे ऐय्यार होंगे।।

जो मजहब की रही ऐसी ही हालत।
तो सच कहता हूँ हम बीमार होंगे।।

लगा की दीप रौशन कर मुहब्बत।
मेरा जुगनू सा सब परिवार होंगे।।

वो घूँघट में छिपा कर रुख मिले हैं।
लगा था इश्क में दीदार होंगे।।

जरा समझो हयाती इस रिदम को।
तभी ऐ दोस्त सब गुलजार होंगे।।
मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 12, 2016 at 9:19pm
वाह्ह।बेहतरीन भाव!बधाई आदरणीय

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 12, 2016 at 5:02pm

एक अच्छे ग़ज़ल प्रयास के लिए हार्दिक बधाइयाँ , भाई बिंदौरी जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 4, 2016 at 10:47am

आ० भाई बिंदौरी जी ,इस सूंदर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई .

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 3, 2016 at 6:49pm
बेहतरीन
Comment by Rahila on April 2, 2016 at 10:29pm
बहुत खूब, बहुत खूब वाह.. बहुत ही शानदार गज़ल कही आद. आमोद जी! बहुत बधाई । सादर
Comment by Samar kabeer on April 1, 2016 at 3:04pm
जनाब आमोद बिन्दौरी जी आदाब,ये ग़ज़ल भी अच्छी रही,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।

तीसरे शैर के ऊला मिसरे में 'काम'को "कम"कर लें ।

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