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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – April 2025 Archive (2)

मौत खुशियों की कहाँ पर टल रही है-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२

**

आग में जिसके ये दुनिया जल रही है

वह सियासत कब तनिक निश्छल रही है।१।

*

पा लिया है लाख तकनीकों को लेकिन

और आदम युग में दुनिया ढल रही है।२।

*

क्लोन का साधन दिया विज्ञान ने पर

मौत खुशियों की कहाँ पर टल रही है।३।

*

मान मर्यादा मिटाकर पाप करती

(भूल जाती मान मर्यादा सदा वह)

भूख दौलत की जहाँ भी पल रही है।४।

*

गढ़ लिए मजहब नये कह बद पुरानी

पर न सीरत एक की उज्वल रही है।५।

*

दौड़ती नफरत हमेशा फिर रही…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 30, 2025 at 11:41am — 13 Comments

पहलगाम ही क्यों कहें - दोहे

रक्त रहे जो नित बहा, मजहब-मजहब खेल।

उनका बस उद्देश्य यह, टूटे सबका मेल।।

*

जीवन देना कर सके, नहीं जगत में कर्म।

रक्त पिपाशू लोग जो, समझेंगे क्या धर्म।।

*

छीन किसी के लाल को, जो सौंपे नित पीर।

कहाँ धर्म के मर्म को, जग में हुआ अधीर।।

*

बनकर बस हैवान जो, मिटा रहे सिन्दूर।

वही नीच पर चाहते, जन्नत में सौ हूर।।

*

मंसूबे उनके जगत, अगर गया है ताड़।

देते है फिर क्यों उन्हें, कहो धर्म की आड़।।

*

पहलगाम ही क्यों कहें, पग-पग मचा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 30, 2025 at 11:26am — 3 Comments

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