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Sushil Sarna's Blog – December 2024 Archive (9)

दोहा पंचक. . . रोटी

दोहा पंचक. . . रोटी

सूझ-बूझ ईमान सब, कहने की है बात ।

क्षुधित उदर के सामने , फीके सब जज्बात ।।

मुफलिस को हरदम लगे, लम्बी भूखी रात ।

रोटी हो जो सामने, लगता मधुर प्रभात ।।

जब तक तन में साँस है, चले क्षुधा से जंग ।

बिन रोटी फीके लगें, जीवन के सब रंग ।।

मान-प्रतिष्ठा से बड़ी, उदर क्षुधा की बात ।

रोटी के मोहताज हैं, जीवन के हालात ।।

स्वप्न देखता रात -दिन, रोटी के ही दीन ।

इसी जुगत में दीन यह , हरदम रहता लीन…

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Added by Sushil Sarna on December 25, 2024 at 2:37pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .

दोहा पंचक. . .

बाण न आये लौट कर, लौटें कभी न प्राण ।

काल गर्भ में है छुपा, साँसों का निर्वाण ।।

नफरत पीड़ा दायिनी, बैर भाव का मूल ।

जीना चाहो चैन से, नष्ट करो यह शूल ।।

आभासी संसार में, दौलत बड़ी महान ।

हर कीमत पर बेचता , बन्दा अब  ईमान ।।

अन्तर्घट के तीर पर, सुख - दुख करते वास ।

सूक्ष्म सत्य है देह में, वाह्य जगत  आभास ।।

जीवन मे  होता नहीं, जीव कभी संतुष्ट ।

सब कुछ पा कर भी सदा, रहे ईश से रुष्ट ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on December 23, 2024 at 2:42pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .व्यवहार

दोहा पंचक. . . व्यवहार

हमदर्दी तो आजकल, भूल गया इंसान ।

शून्य भाव के खोल में, सिमटा है नादान ।।

मुँह बोली संवेदना, मुँह बोला व्यवहार  ।

मुँह बोले संसार में, मुँह बोला है प्यार ।।

भूले से तकरार में, करो न  ऐसी बात ।

जीवन भर देती रहे, वही बात आघात ।।

अन्तस में कुछ और है, बाहर है कुछ और ।

उलझन में यह जिंदगी, कहाँ सत्य का ठौर ।।

दो मुख का यह आदमी, क्या इसका विश्वास ।

इसके अंतर में सदा, छल करता है वास ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on December 21, 2024 at 3:36pm — No Comments

दोहा पंचक. . . दिन चार

दोहा पंचक. . . . दिन चार

निर्भय होकर कीजिए, करना है जो काम ।

ध्यान रहे उद्वेग में, भूल न जाऐं राम ।।

कितना अच्छा हो अगर, मिटे हृदय से बैर ।

माँगें अपने इष्ट से, सकल जगत् की खैर ।।

सच्चे का संसार में, होता नहीं  अनिष्ट ।

रहता उसके साथ में, उसका  अपना  इष्ट ।।

पर धन विष की बेल है, रहना इससे दूर ।

इसकी चाहत के सदा, घाव बनें  नासूर ।

चादर के अनुरूप ही, अपने पाँव पसार ।

वरना फिर संघर्ष में, बीतेंगे दिन चार ।।

सुशील सरना…

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Added by Sushil Sarna on December 20, 2024 at 3:49pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .शीत शृंगार

दोहा पंचक. . . शीत शृंगार



नैनों की मनुहार को, नैन करें स्वीकार ।

प्रणय निवेदन शीत में, कौन करे इंकार ।।

मीत करे जब प्रीति की, आँखों से वो बात ।

जिसमें बीते डूबकर,  आलिंगन में रात ।।

अभिसारों में व्याप्त है, मदन भाव का ज्वार ।

इस्पर्शों के दौर में, बिखरा हरसिंगार ।।

बढ़े शीत में प्रीति की, अलबेली सी प्यास ।

साँसें करती मौन में, फिर साँसों से रास ।।

अंग-अंग में शीत से, सुलगे प्रेम अलाव ।

प्रेम क्षुधा के वेग में, बढ़ते गए कसाव…

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Added by Sushil Sarna on December 18, 2024 at 8:19pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .यथार्थ

दोहा पंचक. . . . यथार्थ

मन मंथन करता रहा, पाया नहीं  जवाब ।

दाता तूने सृष्टि की, कैसी लिखी किताब।।

आदि - अन्त की जगत पर, सुख - दुख करते रास ।

मिटने तक मिटती नहीं, भौतिक सुख की प्यास ।।

जीवन जल का बुलबुला, पल भर में मिट जाय ।

इससे बचने का नहीं, मिलता कभी उपाय ।।

साँसों के अस्तित्व का, सुलझा नहीं सवाल ।

दस्तक दे आता नहीं, क्रूर नियति का काल ।।

साम दाम दण्ड भेद सब, कितने करो प्रपंच ।

निश्चित तुमको छोड़ना, होगा जग का मंच…

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Added by Sushil Sarna on December 10, 2024 at 1:39pm — 4 Comments

कुंडलिया. . . .

कुंडलिया. . . . 

बच्चे अन्तर्जाल पर , भटक  रहे  हैं  आज ।
दुर्व्यसन   में   भूलते, जीवन  की  परवाज ।
जीवन की परवाज , लक्ष्य यह भूले अपना ।
बिना कर्म यह अर्थ , प्राप्ति का देखें सपना ।
जीवन   से  अंजान, उम्र  से  हैं  यह  कच्चे ।
आज  नशे   में   चूर , भटकते  देखे   बच्चे ।

सुशील सरना / 8-12-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on December 8, 2024 at 8:00pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . कागज

दोहा पंचक. . . कागज

कागज के तो फूल सब, होते हैं निर्गंध ।

तितली को भाते नहीं, गंधहीन यह बंध ।।

कितनी बेबस लग रही, कागज की यह नाव ।

कैसे हो तूफान में,साहिल पर ठहराव ।।

कागज की कश्ती चली, लेकर कुछ अरमान ।

रेजा - रेजा कर गया , स्वप्न सभी तूफान ।।

कैसी भी हो डूबती, कागज वाली नाव ।

हृदय विदारक दृश्य से, नैनों से हो स्राव ।

कागज पर लिख डालिए, चाहे जितने भाव ।

कागज कभी न भीगता, कितने ही हों घाव ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on December 3, 2024 at 8:57pm — 4 Comments

कुंडलिया ....

कुंडलिया. . . . 

मीरा को गिरधर मिले, मिले  रमा को  श्याम ।
संग   सूर  को  ले  चले, माधव  अपने  धाम ।
माधव  अपने धाम , भक्ति की अद्भुत  माया ।
हर मुश्किल में साथ, श्याम की चलती छाया ।
भजें  हरी  का  नाम , साथ  में  बजे  मँजीरा ।
भक्ति भाव  में डूब, रास  फिर  करती  मीरा ।

सुशील सरना / 1-12-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on December 1, 2024 at 9:10pm — 4 Comments

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