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रंग काला :

जाने कितने रंग सृष्टि के
अद्भुत लेकिन है रंग काला

काली अलकें काली पलकें
काले नयन लगें मधुशाला
काला भँवरा
हुआ मतवाला

काला टीका नज़र उतारे
काला धागा पाँव सँवारे
काली रैना चंदा ढूंढें
अपना शिवाला

काले में हैं सत्य के साये
हर उजास के पाप समाए
रैन कुटीर सृष्टि की शाला
रंग सपनों को
भाए काला

काले से तो भय व्यर्थ है
इसमें जीवन का अर्थ है
आदि अंत का ये है प्याला
हर यथार्थ को
इसने पाला

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 584

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Comment by Sushil Sarna on June 3, 2020 at 9:09pm

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर जी सृजन के भावों पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार। कुछ तकनीकी व्यवधान के चलते मैं आभार व्यक्त न कर सका। इसके लिए क्षमा चाहूंगा। सादर ।

Comment by Sushil Sarna on June 3, 2020 at 9:09pm

आदरणीय Samar kabeer जी सृजन के भावों पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार। कुछ तकनीकी व्यवधान के चलते मैं आभार व्यक्त न कर सका। इसके लिए क्षमा चाहूंगा। सादर ।

Comment by Sushil Sarna on June 3, 2020 at 9:08pm

आद0 Rakshita Singh  जी सृजन के भावों पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार। कुछ तकनीकी व्यवधान के चलते मैं आभार व्यक्त न कर सका। इसके लिए क्षमा चाहूंगा। सादर ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 25, 2020 at 8:47am

आ. भाई सुशील जी, अच्छी कविता हुई है। हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on May 25, 2020 at 6:24am

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी कविता हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by रक्षिता सिंह on May 24, 2020 at 3:29pm

आदरणीय सुशील जी नमस्कार, 

बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ ... 

वास्तव  में काले रंग की यह भी विशेषता है कि इस पर कोई और रंग नहीं चढ़ता !

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