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वो मेरा करीबी था, मैं मगर फरेबी था

इश्क़ वो वफाओं वाली, चाह बन के रह गयी

जो भी सितम हुए, सब मैंने ही सनम किए

टोकड़ी दुआओं वाली, आह बनके रह गयी

 

था मेरा गरूर उसको, मेरा था शुरूर उसको

साथ जब मैंने छोड़ा, आंखे नम रह गयी

सपनों का था  एक क़िला, मिलने का वो सिलसिला

तोड़ा उसके दिल को मैंने, पल मे सारी ढह गयी

वादे उसकी सच्ची थी, मेरी डोर कच्ची थी

फर्जी मेरी वायदे मे, फंस के जैसे रह गयी

बेरहम  सा प्यार मेरा , मोम जैसा दिल था उसका

मेरी खुदगर्जि के आगे, अफसोस करके रह गयी

 

था बड़ा सुकून उसको, मेरा था यकिन उसको

चालबाज़ियों को मेरी, हंस के सारी सह गयी

उसकी खातिर दो जहाँ था, मैं ही उसका आसमा था

देख के ठगी को मेरे, बस सिसक के रह गयी

     

इश्क़ उसकी साधना थी, मेरे मन मे वासना थी

देख के ये रूप मेरा, वो ठिठक के रह गयी

वो थी उसकी आरज़ू थी, बस मेरी ही जुस्तजू थी

राह ये गलत थी लेकिन, साथ मेरे चल पड़ी

उसके दिल की ये लगी थी, मेरी तो बस दिल्लगी थी

दिल्लगी मे जाने क्यों वो, दिल को लगा के रह गयी

"मौलिक व अप्रकाशित"

अमन सिन्हा 

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Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on May 25, 2020 at 9:06am

आदरणीय अमन सिन्हा जी बहुत वेमिशाल रचना है बार बार पढ़ने को जी कर रहा ऐसे लग रहा जैसे मुँह की बात किसी ने छीन ली,बहुत बहुत बधाई

Comment by AMAN SINHA on May 24, 2020 at 3:24pm

श्री "मुसाफिर" जी एवं "कबीर " साहब,

समीक्षा के लिए धन्यवाद । 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 24, 2020 at 8:57am

आ. अमन जी, अच्छी कविता हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on May 21, 2020 at 2:29pm

जनाब अमन सिन्हा जी आदाब, अच्छी रचना है, बधाई स्वीकार करें ।

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