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करेगा तू क्या मिरी वकालत (ग़ज़ल)

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़बूज़ अस्लम
121   22   121   22

फ़रेब-ओ-धोका है ये अदालत
करेगा तू क्या मिरी वकालत [1]

रसूल कितने ही आ चुके पर
गई न इंसान की जहालत [2]

सनम रिझाएँ ख़ुदा मनाएँ
है गू-मगू की ये अपनी हालत [3]

जो मुड़ गया राह-ए-इश्क़ से तो
रहेगी ता-उम्र फिर ख़जालत [4]

किसे फ़राग़त जो दे तवज्जो
दिखाइएगा किसे बसालत [5]

है मुख़्तसर मेरी गुफ़्तगू पर
है ग़ौर और फ़िक्र में तवालत [6]

वो जानते हैं कि उनका 'शाहिद'
गो मनचला पर है ख़ुश-ख़सालत [7]
(मौलिक व अप्रकाशित)
–––––––––––––––––––––
कुछ मुश्किल अलफ़ाज़ के म'आनी:
1. रसूल = पैग़म्बर
2. जहालत = अज्ञानता, मूर्खता
3. गू-मगू = दुविधा
4. ख़जालत = शर्मिंदगी, नदामत
5. फ़राग़त = काम से फ़ुर्सत, अवकाश
6. तवज्जो = ध्यान
7. बसालत = पराक्रम, नायक वाले गुण
8. मुख़्तसर = संक्षिप्त, छोटा
9. तवालत = लम्बाई
10. मनचला = मनमौजी
11. ख़ुश-ख़सालत = अच्छे स्वभाव का

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Comment

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Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on June 6, 2020 at 10:50pm

आदरणीय रूपम कुमार 'मीत' साहिब, जी नहीं नहीं, मैं भी नौ-मश्क़ शाइर ही हूँ, इसलिए कई बार मुश्किल ज़मीनों की ओर खिंच जाता हूँ। ग़ज़ल तक आने के लिए और ज़र्रा-नवाज़ी के लिए आपका हार्दिक आभार!

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on March 14, 2020 at 8:11am

आदरणीय लक्ष्मण भाई, आदाब। ग़ज़ल पर उपस्थिति और प्रोत्साहन के लिए आपका हार्दिक आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 12, 2020 at 12:20pm

आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on March 12, 2020 at 9:44am

आदरणीय उस्ताद-ए-मुहतरम समर कबीर साहिब, सादर प्रणाम। आपकी हौसला-अफ़ज़ाई, रहबरी और इस्लाह के लिए आपका तह-ए-दिल से मशकूर-ओ-ममनून हूँ।

Comment by Samar kabeer on March 12, 2020 at 7:25am

जनाब रवि भसीन 'शाहिद' जी आदाब,ग़ज़ल बहुत अच्छी हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

मक़्ते के सानी मिसरे में 'ख़ुश ख़सालत' शब्द ग़लत है,सहीह शब्द है "ख़ुश ख़िसाल",'ख़िसाल' शब्द 'ख़सलत' का बहुवचन है,इसी तरह 'ख़साइल' शब्द भी 'ख़सलत' का बहुवचन है ।

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