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दोस्तो गर ज़िन्दगी में कामरानी चाहिए
ज़ह्न-ओ-दिल से गर्द नफ़रत की हटानी चाहिए

अर्ज़ कर दूँ आख़िरी ख़्वाहिश इजाज़त हो अगर
एक शब मुझको तुम्हारी मेज़बानी चाहिए

ज़िल्ल-ए-सुब्हानी अगर कुछ आपसे बच पाए तो
हम ग़रीबों को भी थोड़ी शादमानी चाहिए

मूँद कर आँखें न चलना याद रखना ये सबक़
ज़िन्दगी में हर क़दम पर सावधानी चाहिए

ज़िन्दगी में लाज़मी तो है मगर इंसान को
दफ़्न करने के लिये भी माल पानी चाहिए

फ़ज़्ल से रब के मुकम्मल हो गई मेरी ग़ज़ल
दोस्तो अब आपकी बस क़द्र दानी चाहिए

'नूर' साहिब ने लिखी ये ख़त में फ़रमाइश मुझे
हीरे मोती से जड़ी इक कूड़े दानी चाहिए

आज कल तो महफ़िलों में शाइरी के नाम पर
ऐ 'समर' ग़ज़लें नहीं बस नोहा ख़्वानी चाहिए

'समर कबीर'
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on February 15, 2021 at 4:41pm

बहुत शुक्रिय: प्रिय आज़ी तमाम,ख़ुश रहो ।

Comment by Aazi Tamaam on February 15, 2021 at 4:38pm

शुक्रिया इतनी खूबसूरत ग़ज़ल से रू ब रू कराने के लिए

सादर प्रणाम गुरु जी

इक इक शैर लाजवाब........... 

Comment by Samar kabeer on December 1, 2020 at 11:32pm

जनाब नाहक़ साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिय:

Comment by Samar kabeer on December 1, 2020 at 8:49pm

मुहतरमा वीणा गुप्ता जी आपका बहुत बहुत शुक्रिय:

Comment by Veena Gupta on December 1, 2020 at 8:46pm

खूबसूरत ग़ज़ल,कबीर जी बधाई 

Comment by Samar kabeer on November 20, 2020 at 5:24pm

जनाब निलेश जी आपका बहुत बहुत शुक्रिय:

Comment by Samar kabeer on November 20, 2020 at 5:23pm

जनाब बृजेश जी आपका बहुत बहुत शुक्रिय:

Comment by Samar kabeer on November 20, 2020 at 5:22pm

जनाब अनीस जी आपका बहुत बहुत शुक्रिय:

Comment by Samar kabeer on November 20, 2020 at 5:22pm

जनाब तेजवीर सिंह जी आपका बहुत बहुत शुक्रिय:

Comment by Samar kabeer on November 20, 2020 at 5:21pm

जनाब रूपम कुमार जी आपका बहुत बहुत शुक्रिय:

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