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गर तबीयत जाननी है देश की -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२


सादगी से  घर  सँभाला कीजिए
लालसा को मत उछाला कीजिए।१।
*
यह धरा  तो  रौंद  डाली  जालिमों
चाँद का मुँह अब न काला कीजिए।२।
*
करके सूरज से उधारी आब की
चाँद से कहते उजाला कीजिए।३।
*
जब नया देने की कुव्वत ही नहीं
मत फटे में  पाँव  डाला कीजिए।४।
*
गर तबीयत  जाननी  है  देश की
सबसे पहले ठीक आला कीजिए।५।
*
चाँद तारे सिर्फ महलों को न दो
झोपड़ी में भी उजाला कीजिए।६।

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 9, 2021 at 10:45pm

आ. भाई ब्रिजेश जी, गजल की सराहना के लिए धन्यवाद।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 9, 2021 at 9:42pm

बढ़िया ग़ज़ल के लिए बधाई आदरणीय...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 7, 2021 at 12:04pm

आ. भाई आज़ी तमाम जी, अभिवादन। गजल पर उपस्थिति सराहना व टंकण त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद।

लेकिन "की" सही है ।

Comment by Aazi Tamaam on April 7, 2021 at 8:00am

सादर प्रणाम आदरणीय धामी सर

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है

जब नया देने कि कुव्वत ही नहीं...... गौर कीजियेगा शायद

गलती से कि को की व कुव्वत को कुब्बत लिख गया है

सादर

कृपया ध्यान दे...

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