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एक पागल की आत्म गाथा

दुनियाँ कहे मै पागल हूँ

मै कहता पागल नहीं, बस घायल हूँ

कभी व्यंग्य, कभी आक्षेप को

खुद पर रोज मैं सहता, अपनी व्यथा किसे सुनाऊ

कितनी चोटों से घायल हूँ

जीने की मै कोशिश करता, मै इस समाज की रंगत हूँ ||

 

क्यूँ पागल मै कैसे हुआ

पुंछने वाला ना हमदर्द मिला, जो मिला वो ताने कसता  

देख उसे अब मै हँसता हूँ

पल भर में ये वक़्त बदलता

कौन जाने, तेरा आने वाला कल मै ही हूँ

 कितनी चोटों से घायल हूँ ||

 

कोई प्रेम की चोट में पागल

कोई षडयंत्रो का शिकार हुआ, कोई घर का भेदी बन

मेरी दशा में आ गिरा

कोई यारों से धोखा खाया किसी को शत्रुओ ने

जीते जी ही मार दिया

जाने कैसी परिस्थिति थी, जाने किस मुसीबत का शिकार हुआ||

 

हस्ती गंवा के अपनी मैं

ठोकर जन-जन की खाता हूँ, लोगो के हसने कारण बनता

करतब भी खूब दिखाता हूँ

ना भूख प्यास की फिकर मुझे, जो मिले खा लेता हूँ

ना बैड-बिस्तर की अब चिंता ही

जमीन पे ही सो जाता हूँ, मौसम का भी भान नहीं

हर मौसम में ढलता जाता हूँ ||

 

दुनिया की नजरों में पागल हूँ

पर रोज सपने नए मै बुनता हु

सही सलामत कर ना सका जो, पागल बनकर करता हूँ

जीने की मै कोशिश करता, पर आत्महत्या ना करता हूँ

सबसे बुरा जग का ये कर्म है

इतनी सोच तो रखता हूँ, कहने को मै पागल हूँ

जाने कितनी चोटों से घायल हूँ ||

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by PHOOL SINGH on December 10, 2019 at 4:47pm

कबीर साहब को मेरी रचना के लिए समय निकालने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद 

Comment by Samar kabeer on December 9, 2019 at 5:18pm

जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना है,बधाई स्वीकार करें ।

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