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PHOOL SINGH's Blog (37)

आओ मिलकर घर बनाये

ईट पत्थर से बना मकान

उसमें रहते दो इंसान

रिश्तों को वो कदर न करते

एक-दूजे से बात ना करते

कहने को एक मकान में रहते

पर एक-दूजे से घृणा करते

मकान की परिभाषा

को सिद्ध करते ||

 

कच्ची मिटटी का एक, छोटा घर

स्वर्ग से सुंदर, प्यारा घर

एक परिवार की जान था, जो  

प्रेम की सुंदर मिशाल था, वो

सब सदस्य साथ में रहते

हसतें-खेलतें घुल-मिल रहते

नारी के सम्मान के संग सब  

एक दूजे का आदर…

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Added by PHOOL SINGH on April 16, 2019 at 4:47pm — No Comments

हैरान हो जाता हूँ, जब कभी

आँखों में अश्रु निकल आते है मेरे

इतिहास में जा, जब खोजता हूँ

नारी उत्पीडन की प्रथाओ की

कड़ी से कड़ी मै जोड़ता हूँ

हैरान हो जाता हूँ, जब कभी

इतिहास में जा, जब खोजता हूँ

 

कैसी नारी कुचली जाती

चुप होके क्यों, सब सहती थी

बालविवाह जैसी, कुरूतियों की खातिर

सूली क्यों चढ जाती थी

सती होने की कुप्रथा में क्यों

इतिहास नया लिख जाती थी

चुप होके क्यों, सब सहती थी

सूली क्यों चढ जाती थी ||

 

जब कभी…

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Added by PHOOL SINGH on April 16, 2019 at 10:45am — 4 Comments

देशभक्ति का चोला

देशभक्ति का चोला पहन

देश का युवा घूम रहा

मतवाला होके डोल रहा

ऐसा देशभक्ति में डूब रहा||

 

घूम घूम कर,

झूम झूम कर

वीरो की गाथा खोज रहा

ऐसा देशभक्ति में डूब रहा||

 

बलिदान को अपने वीरो के

हर पल हर क्षण को

रम रमा कर यादों में अपनी

खोया-खोया फिर रहा||

ऐसा देशभक्ति में डूब रहा||

 

"मौलिक और अप्रकाशित"

 

Added by PHOOL SINGH on April 12, 2019 at 3:30pm — No Comments

कर्म ओर किस्मत

उम्र संग ये बढती है

कर्म से अपने चलती है

परीक्षा धैर्य की लेकर

मार्ग प्रशस्त ये करती है||

 

कर्म के पथ पर चढ़कर

ये, अगले कदम को रखती है

हार-जीत के थपेड़े दे देकर

निखार हुनर में करती है||

 

त्रुटी को सुधार के तेरी

आत्मविश्वास से बढ़ती है

उतार चढ़ाव के मार्ग बना

हर परस्थितियो लड़ने को  

तैयार हमें ये करती है||

 

तरक्की की सीढी चढ़े सदा

लक्ष्य निर्धारित करती है

उठा-गिरा…

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Added by PHOOL SINGH on April 12, 2019 at 3:05pm — 2 Comments

जीना हमकों सिखा दिया

वक्त की उठक बैटक ने

जीना हमकों सिखा दिया

जिन्दगी की पेचीदा परिस्थितयों से

लड़ना हमकों सिखा दिया

जीना हमकों सिखा दिया||

 

मुखौटों में छुपे चहरों से

रूबरू हमकों करा दिया

क्या कहेगी ये दुनियाँ

इस उलझन से जो छुड़ा दिया   

जीना हमकों सिखा दिया ||

 

लोग कहे तो हंसे हम

और कहे तो रोये

लोगों के हाथो चलती, जिंदगी को

खुल के जीना सिखा दिया

जीना हमकों सीखा दिया ||

 

साथ ना छोड़ेगे के…

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Added by PHOOL SINGH on April 11, 2019 at 5:21pm — 3 Comments

नींद जो कहलाती हूँ

श्रांत स्लॉथ हो, जब
घर, लौट के आता
तुझे विश्राम कराती हूँ,
हर थकान को मैं, मिटाकर
आराम तुझे दिलाती हूँ,
नींद जो कहलाती हूँ||
.
हर व्यथा और तिरस्कार को,
मैं भुलाकर
सपनों की सैर कराती हूँ
विचित्र दुनियाँ में
तुझे घुमाकर,
ख़ुशी तुझे दिलाती हूँ,
नींद जो कहलाती हूँ||
.
कभी नृप कभी रंक बनाकर
ब्रह्मांड का खेल दिखाती…
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Added by PHOOL SINGH on January 9, 2019 at 3:00pm — 3 Comments

फूल की कहानी -फूल की जबानी

मैं सक्षम, हूँ विलक्षण

निर्मल करता, विचलित मन

पुलकित कर तेरे, तन मन

सुगन्धित करता, वन उपवन

प्रकृति का श्रृंगार कर

महक का प्रसार कर

चिंतन करता हर एक क्षण

खुशियाँ देता मैं पल पल

न्योछावर अपना जीवन कर

कभी मंदिर, कभी जमी में

कभी रेंगता धूलि में

जीवन की प्रवाह ना कर

खुशियाँ बाटता हर एक क्षण

कभी कंठ की शोभा बनता 

कभी बढाता शोभा शव

कभी गजरा नारी बनता

कभी में देता सेज सजा

क्षण भर के…

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Added by PHOOL SINGH on January 7, 2019 at 4:30pm — 4 Comments

एक वीर, ऐसा जन्मा था

इस भारत माँ की, धरती पर,

एक वीर, ऐसा जन्मा था, सोचा था तब, किसी ने

“ऐसा” कारनामा, उसे करना था

इस भारत माँ की, धरती पर,

एक वीर, ऐसा जन्मा था ||

 

जीवन के संघर्षो से, ना उसे कभी

डरना था, रूढ़िवादी धारा को भी,

उसे, आगे जा बदलना था

इस भारत माँ की, धरती पर,

एक वीर, ऐसा जन्मा था ||

 

सती हो जाती थी, जो नारी,

सुहाग गंवाने पर, “पुर्नविवाह”,

का अधिकार, उसे दिलाना था

महिलाओं के उत्पीड़न की…

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Added by PHOOL SINGH on January 3, 2019 at 4:34pm — 2 Comments

मैं गलती का पुतला हूँ

अपने बारे क्या बताऊँ

      मैं गलती का पुतला हूँ

सही-गलत का ज्ञान नहीं

      पर, दिल की अपने सुनता हूँ

अपने बारे क्या बताऊँ

                 मैं गलती का पुतला हूँ||

 

ऊँच -नीच का भेद नहीं

                विश्वासघात ना करता हूँ

सीरत नहीं मैं, भाव देखता

                 प्रेम सभी से करता हूँ

 अपने बारे क्या बताऊँ

                 मैं गलती का पुतला हूँ||

 

आस्तिक हूँ मैं धर्म…

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Added by PHOOL SINGH on December 31, 2018 at 12:04pm — 2 Comments

शरद ऋतू

मैं इठलाती,

मैं बलखाती,

मंद चाल से,

बढ़ती हूँ

शरद ऋतु जब,

वर्ष में आये

अपना जाल,

बिछाती हूँ||

 

कहीं थपेड़े,

पवन दिलाती

कहीं,

बर्फ पिघलाती हूँ

कहीं,

तरसते धूप

को सब जन

कहीं कपकपी,

खूब दिलाती हूँ

वर्षा ऋतू,

के बाद में आयी,

शरद ऋतू,

कहलाती हूँ||

 

कोई निकाले,

कम्बल अपने,

कोई,

रजाई खोज रहा

कोई जला…

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Added by PHOOL SINGH on December 17, 2018 at 3:00pm — 8 Comments

फिर लौट कर ना आनी है

बुलबुले सी होती जिंदगी

मिट्टी में मिल जानी है

जो भी करना आज ही कर ले

फिर लौट कर ना आनी है||

 

पंख लगा के अरमानों के

नभ में उड़ान तो भर

निर्भय होके बढ़ता चल

जो भी करना आज ही कर ले

कल की किसने जानी है||

 

कहीं किसी ने, बात बड़ी

इंतज़ार में तेरे, मौत खड़ी

इच्छा अपनी पूरी कर ले

ये, वक्त देने वाली है

बुलबुले सी होती जिंदगी

मिट्टी में मिल जानी है…

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Added by PHOOL SINGH on December 14, 2018 at 3:30pm — 3 Comments

जाम से मुक्त, सारे शहर को कर दूँ

अवाक् रह गया, देख जाम को

खड़ा खड़ा मैं सोच रहा

जाम से मुक्त, सारे शहर को कर दूँ

ऐसा उपाय कोई खोज रहा ||

  

बस स्टैंड और प्लेटफॉर्म पर

जीवन, लोगों का बीत रहा

देश के सारे एयरपोर्ट पर

ना, दिन रात का भेद रहा

भगदड़ सी इस जिंदगी में

जैसे, इंसान खो सा गया

खड़ा खड़ा मैं सोच रहा

आश्चर्य से सब देख रहा ||

 

 बस भीड़ से भरी पड़ी

रेलें भी सारी लधी पड़ी

मोटरबाइक की झड़ी लगी

और कार रोड़ पर पार्क…

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Added by PHOOL SINGH on December 11, 2018 at 4:00pm — 3 Comments

जीवन संगिनी

हार हार का टूट चुका जब

तुमसे ही आश बाँधी है

मैं नहीं तो तुम सही

समर्थ जीवन की ठानी है||

 

मजबूर नहीं मगरूर नहीं मैं 

मोह माया में चूर नहीं मैं

साथ…

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Added by PHOOL SINGH on December 10, 2018 at 4:30pm — 1 Comment

शायद मैंने पी ली मधुशाला

 सुन्दर सुन्दर शब्दों का

संग्रह मैंने तो कर डाला

उपयोग नहीं, प्रयोग न जानू

मैंने पी ली मधुशाला

 

कविता लिखने के चक्कर में

मैंने क्या क्या कर डाला

लय नहीं तो क्या हुआ

मैंने प्रयास कर डाला

 

कवि बनने की चाह नहीं

पर कविता लिखना चाहूँ मैं

गीत नहीं संगीत नहीं

पर कविता सुनना चाहूँ…

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Added by PHOOL SINGH on January 19, 2016 at 9:56am — 10 Comments

दाँस्ता- आज के इंसान की

दाँस्ता- आज के इंसान की

 

मेरा व्यक्तित्व क्या है बोलो

स्वार्थी चाहे दम्भी बोलो

अहंकारी, कुकर्मी बोलो

जो भी बोलो सोच के बोलो

मेरा व्यक्तित्व क्या है बोलो

 

स्वार्थसिद्धि की, ताक की में रहता

क्षणभर की ना देरी करता

भिन्न भिन्न अपने वेश बदल के

जन भावना की बातें करता

कौन हूँ मैं, तुम कुछ तो बोलो

जो भी बोलो सोच के बोलो

 

 रोते को, मैं खूब…

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Added by PHOOL SINGH on January 15, 2016 at 9:55am — 2 Comments

मुक्तिदाता मृत्यु

मैं स्वछन्द घूमती रहती

जिसको चाहे उसे ले जाती

भनक भी न उसे लगाती

दुखो से मुक्ति झट दे जाती

मृत्यु मैं जो कहलाती

जीवन का दस्तूर बताती

लालसा को परिपूर्ण कराती

बर्बरस्ता को यूँ मिटाती

पूर्ण आनंद का अनुभव कराती

मृत्यु मैं जो कहलाती

खुले क्षितिज में तुम्हे घुमाती

जीवन- मरण का भेद कराती

रिस्तो का तुम्हे बोध करा

सत्यता की दुनिया दिखाती

मृत्यु मैं जो कहलाती

फल बुराई का तुझे दिखाती

अंत समय जब मैं…

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Added by PHOOL SINGH on January 8, 2016 at 11:30am — 3 Comments

क्या होगा इस देश का भविष्य

हमने सुना है कि शिक्षक कि नजर में सभी बच्चे एक सामान होते है लेकिन इस कहानी को पढने के बाद शायद ये बात गलत ही साबित होती नजर आती है l

यह कहानी एक छोटे से गॉव कि है जहाँ एक विधालय में सभी जाति के बच्चे पढ़ते थे और हर एक कक्षा में लगभग ६०-८० बच्चे हुआ करते थे l उसमे रामू और उसके कुछ दोस्त जो निम्न जाति के थे, पढ़ते थे l इसी स्कुल में एक अध्यापक बाबु जो उच्च जाति से सम्बन्ध रखता था सदा निम्न जाति के बच्चो को हीन दृष्टि से देखता था और व्यव्हार से कंजूस व् लालची था l वह स्कूल में कम पढाई…

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Added by PHOOL SINGH on December 11, 2012 at 11:20am — 5 Comments

अपने दुःख से नहीं दुसरे के सुखसे दुखी

 

कर्ण और राम दो मित्र थे l राम एक व्यापारी बन गया लेकिन कर्ण अभी भी बेरोजगार था जिसकी वजह से उसकी घर की हालत ठीक नहीं थी l समय समय पर राम भी अपने मित्र की मदद कर देता था कुछ समय तक ऐसे ही चलता रहा l और एक दिन कर्ण को एक अच्छी नौकरी मिल गई जिस कारण घर में किसी वस्तु की कमी नही रह गई थी और धीरे धीरे धन की समस्या भी समाप्त होने लगी थी l इस कारण अब वह अपनी जिंदगी सही से और शांति की जिन्दगी जी रहा था l  व्यापार मैं व्यस्त होने की वजह से राम और कर्ण एक दुसरे से मिल नहीं पाए…

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Added by PHOOL SINGH on December 5, 2012 at 5:01pm — 7 Comments

गीता के १८ अध्याय

 

चारो ओर, खड़े है सैनिक

युद्ध में जीत दिलाने को

शोक करुणा से, अभिभूत है अर्जुन

देख, रक्त सम्बन्धी रिश्तेदारों को

खड़े हुए है अब कृष्णा

उसे शोक से मुक्त कराने को

देहान्तरं  की प्रक्रिया कैसी

संक्षेप में ये समझाने को

अजर अमर है जीवात्मा

स्मरण रखना इस ज्ञान को

खड़ा हो जा धनुष उठा

अपना धर्म निभाने को

मरे हुओ को मार डालना

जग में नाम कराने को

अपने पराये से मुहँ मोड़ लो

पाप पुण्य की चिंता…

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Added by PHOOL SINGH on December 3, 2012 at 5:42pm — 3 Comments

कसाब को फाँसी

सरकार की अपना करो बखान

क्या खूब किया इसने इंसाफ

खाली कर दिया देश खजाना

बचाने को आतंकी मियां “कसाब”

 

हत्याओं की लगा कतार

फाँसी लटके खुद भी यार

पाप की सजा जो तुमने पाई

पाक की इज्जत खाक मिलाई

 

आतंकियों का बन शिरोमणि

ताज पर बमो की झड़ी लगाई

बेगुनाहों का मार के यारा

माफ़ी की फिर गुहार लगाई

 

जख्म भी ऐसे दिए जहाँ को

शैतान भी ले सर झुका

जेल में रह कर भी

पड़ा ना…

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Added by PHOOL SINGH on November 22, 2012 at 11:30am — 6 Comments

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