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हैरान हो जाता हूँ, जब कभी

आँखों में अश्रु निकल आते है मेरे

इतिहास में जा, जब खोजता हूँ

नारी उत्पीडन की प्रथाओ की

कड़ी से कड़ी मै जोड़ता हूँ

हैरान हो जाता हूँ, जब कभी

इतिहास में जा, जब खोजता हूँ

 

कैसी नारी कुचली जाती

चुप होके क्यों, सब सहती थी

बालविवाह जैसी, कुरूतियों की खातिर

सूली क्यों चढ जाती थी

सती होने की कुप्रथा में क्यों

इतिहास नया लिख जाती थी

चुप होके क्यों, सब सहती थी

सूली क्यों चढ जाती थी ||

 

जब कभी में सोचता हूँ

इंसा नहीं क्या पशु थी वो

जो काम नरबलि में भी आती थी

रही सही जो कसर बची तो

देवदासी बन जाती थी

विधवा होने पर ना कभी

शादी वो कर पाती थी

ना,किसी को दया आती थी

शिकार नारी हो जाती थी  ||

 

यही-कहीं हर देश में  

नारी का शोषण होता है

परम्परा का का दामन ओढे

अशिक्षिता ने रोका है

परिवारवाद कहीं, कहीं भावात्मकता

रिश्ते ने नारी को सदा ही लूटा है

यही-कहीं हर देश में  

नारी का शोषण होता है

 

इन कुरूतियों उन्मूलन कर

जड़ से इन्हें मिटाना हो  

नारी का सम्मान बचाकर

जीना उन्हें सिखाना हो  

पढ़ा-लिखा शिक्षित करना

ये मानव धर्म हमारा हो

जड़ से इन्हें मिटाना हो ||

“ मौलिक व् अप्रकाशित”

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Comment

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Comment by PHOOL SINGH on April 22, 2019 at 9:44am

"भाई ब्रिजेश" हौसलाअफजाई के लिए आपका कोटि कोटि धन्यवाद|

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 19, 2019 at 3:36pm

उत्तम सन्देशप्रद रचना आदरणीय..बधाई

Comment by PHOOL SINGH on April 16, 2019 at 4:49pm

कबीर साहब, हौसलाअफजाई के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद, मुझे खुशी है कि आप मेरी रचना को पढ़ते है और कुछ अच्छा लिखने के लिए प्ररित भी|

Comment by Samar kabeer on April 16, 2019 at 3:01pm

जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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