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क्षणिकाएँ -1--डा० विजय शंकर

क्षणिकाएँ
आकर्षित करती हैं , लुभाती हैं ,
क्षण भर को चौंका भी देतीं हैं ,
स्तब्ध भी कर देती हैं , बस .
फिर हम अपने - अपने
महाकाव्य में लौट आते हैं||

* * * * * * * * * * * * * * * * * *
हर व्यथा को हर कथा को
हर छोटी बड़ी बात को
साहित्य में छाप देने भर से
समस्याओं का अंत नहीं होता ,
समस्याओं से जूझना पड़ता है
उनकें हल यूँ नहीं मिलते
उन्हें ढूंढना पड़ता है ||

* * * * * * * * * * * * * * * * * *
सोहबत का असर होता है ,
कहाँ होता है .
जब से गुलाब है ,
काँटों का साथ है ,
न गुलाब की कीमत घटी ,
न काँटों की कीमत बढ़ी ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित.

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on September 2, 2014 at 9:52pm
आदरणीय डॉo आशुतोष मिश्रा जी , क्षणिकाएँ पसंद आईं , बहुत बहुत धन्यवाद .
सादर .
Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 2, 2014 at 9:27am

समस्याओं से जूझना पड़ता है
उनकें हल यूँ नहीं मिलते.......पूरी तरह सहमत ...बहुत ही उम्दा बात है 

उन्हें ढूंढना पड़ता है ||

गुलाब और कांटो का सन्दर्भ भी बेहद पसंद आया  इस शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई के साथ 

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 1, 2014 at 2:47pm
आदरणीय सौरभ पांडे जी, बधाई के लिए ह्रदय से धन्यवाद .
Comment by Dr. Vijai Shanker on September 1, 2014 at 2:45pm
आदरणीय सविता मिश्रा जी, रचना स्वीकार करने के लिए धन्यवाद .

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 1, 2014 at 2:18pm

तीनों क्षणिकाओं के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय

Comment by savitamishra on September 1, 2014 at 12:38pm

न गुलाब की कीमत घटी ,
न काँटों की कीमत बढ़ी ॥.....सही बात दोनों ही अपने अपने महत्वा को बनाये हुए है .....सादर नमस्ते भैया

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 31, 2014 at 11:27am
आदरणीय राम शिरोमणि पाठक जी , बधाई के लिए ह्रदय से धन्यवाद .
Comment by ram shiromani pathak on August 30, 2014 at 8:36pm
anupam prastuti adarneey hardik badhai apko
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 30, 2014 at 8:32pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 30, 2014 at 6:47pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी।

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