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दोहे -12 (पापा कहते थे)

धैर्य रखो मत हो विकल,सुन लो मेरी बात!
अल्प दिवस हैं कष्ट के ,होगी स्वर्ण प्रभात!!

लोभ कपट को त्यागकर,मीठी वाणी बोल!!
यह जीवन का सार है,सहज वृत्ति अनमोल!!

अपनापन गोठिल जहाँ,वहाँ परस्पर द्वंद !
पापा कहते थे वहाँ ,बढ़ते दुःख के फंद!!

भ्रष्ट आचरण त्यागकर,करना मधुरिम बात !
होगी वर्षा नेह की,प्यार भरी सौगात !!

पापा कहते थे सदा,सुन लो मेरे लाल!
जीवन में होना सफल ,बहके कदम सँभाल!!

सत्कर्मों से ही सदा,होता जग में नाम!
पापा की यह सीख थी,लो विवेक से काम!!
************************************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by ram shiromani pathak on December 16, 2013 at 9:30pm

हार्दिक आभार आदरणीय गोपाल जी। ..  सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 16, 2013 at 6:03pm

आदरनीय राम शिरोमणी भाई , हर दोहा कोई न कोई सदेश दे रहा है , बहुत सुन्दर !!! आपको बधाई !!

बस ! दिवस के लिये क्षणिक कहना कितना सही है , मै नही जानता ॥

Comment by Meena Pathak on December 16, 2013 at 4:40pm

सुन्दर दोहे .. बधाई आप को आ० राम शिरोमणि जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 16, 2013 at 2:28pm

रामशिरोमणि जी ...पापा की सीख को दोहों के माध्यम से अत्यंत खूबसूरती से प्रस्तुत किया है आपने ..आपके इस प्रयास पर आपको हार्दिक बधाई ..सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 16, 2013 at 2:10pm

पाठक जी

पापा  प्रदत्त संस्कार से युक्त दोहों का कथ्य प्रभावपूर्ण है i

कृपया ध्यान दे...

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