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ग़ज़ल नूर की-2-ऐ ख़ुदा! रूतबा इबादत-गाहों का अपनी जगह

२१२२/२१२२/२१२२/२१२ 
.

ज़ाहिदो! रूतबा इबादत-गाहों का अपनी जगह
पर सुकूँ की राह में है मैकदा अपनी जगह.
.  
इश्क़ में मजबूरियों को बेवफ़ाई क्यूँ कहें   
चाहना अपनी जगह था भूलना अपनी जगह.
.
सादा-दिल होने के दुनिया में कई नुक्सान हैं
पर किसी के काम आने का मज़ा अपनी जगह.
.
आपने जब दिल लगाया ही नहीं, समझेंगे क्या?  
जीतना हो शौक़ कोई, हारना अपनी जगह.
.
इम्तिहाँ कब “नूर” का है इम्तिहाँ आँधी का है
रात भर जलता रहेगा यह दीया अपनी जगह.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 836

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2018 at 2:51pm

धन्यवाद आ. डॉ आशुतोष जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2018 at 2:50pm

धन्यवाद आ. नीलम जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 23, 2018 at 11:44am

आदरणीय भाई निलेश जी ..आपकी पिछली ग़ज़ल जैसी यह ग़ज़ल है यह भी उम्दा लगी रचना पर आपको ढेर सारी बधाई सादर 

Comment by Neelam Upadhyaya on April 23, 2018 at 10:51am

आदरणीय नीलेश जी।  खूबसूरत गजल के लिए मुबारकबाद।  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 22, 2018 at 3:38pm

सभी पाठको से निवेदन है कि चौथे शेर को यूँ पढ़ा जाए 
.

जब लगाया ही नहीं दिल आपने समझेंगे क्या'
जीतना हो शौक़ कोई, हारना अपनी जगह.
सादर 
 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 22, 2018 at 3:36pm

जी इसे अभी बदल लेता हूँ..
बहुत बहुत आभार 

Comment by Samar kabeer on April 22, 2018 at 3:34pm

'जब लगाया ही नहीं दिल आपने समझेंगे क्या'

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 22, 2018 at 3:19pm

धन्यवाद आ. समर सर,
यह ग़ज़ल दरअस्ल पिछली वाली की त्रुटियों पर मिसरे सोचते सोचते हो गयी ..
तनाफुर पर विचार करता हूँ लेकिन शायद मुश्किल होगा.. दिल लगाना ज़ुबान का जुमला बन गया है..फिर भी सोचता हूँ..
मार्गदर्शन के लिए आभार 

Comment by Samar kabeer on April 22, 2018 at 3:10pm

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,इस ज़मीन में आपकी ये दूसरी ग़ज़ल भी बहुत उम्दा हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

4थे शैर के ऊला में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें,ये लिखना मेरा फ़र्ज़ है, आग्रह नहीं ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 21, 2018 at 3:47pm

धन्यवाद आ. मनोज कुमार जी 

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