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राम-रावण कथा (पूर्व पीठिका) 22

कल से आगे ........


समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा।


महाराज दशरथ पिता बन गये। बड़ी रानी कौशल्या ने पुत्र को जन्म दिया। दशरथ का मन खुशी से नाचने लगा। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अपना उल्लास कैसे व्यक्त करें। उनका बस चलता तो वे मुकुट आदि सारे राजकीय आडम्बरों को एक ओर रखकर नाचते, गाते, चिल्लाते अयोध्या की सड़कों पर निकल जाते और एक-एक आदमी को पकड़ कर उसे यह शुुभ समाचार सुनाते। पर हाय री पद की मर्यादा ! वे ऐसा नहीं कर सकते थे। फिर भी अयोध्या का कोष खोल दिया गया था। पूरी पुरी को सात दिन तक भरपेट राजकीय भोज खाने को मिला था। सब तृप्त हो गये थे। अन्य बहुमूल्य उपहारों से भी मात्र ब्राह्मण वर्ग ही नहीं समस्त प्रजा कृतकृत्य हो गयी थी। सब प्रसन्न थे।


महाराज के दिन का अधिक भाग अब कौशल्या के महल में ही बीतने लगा। वे कैकेयी के महल में भी दिन में कई बार जाते थे, वे भी तो किसी भी दिन माता बनने वाली थीं, पर अधिक समय रुक नहीं पाते थे। गुरुदेव ने जिस दिन बालक का ‘राम’ - सबके मन को रम्यता देनेवाला, नामकरण किया उसके तीसरे दिन ही कैकेयी ने भी उन्हें एक पुत्र रत्न प्रदान कर दिया। आह ! क्या करें दशरथ ? उनका एक पैर बड़ी रानी के महल में तो दूसरा मँझली रानी के, बीच-बीच में समय निकाल कर सुमित्रा के महल में भी। अयोध्या की प्रजा फिर पकवानों के भोज से तृप्त हो रही थी। गुरुदेव ने इस द्वितीय पुत्र का नामकरण किया ‘भरत’।


और !!! विधाता की लीला को भी क्या कहें !
कुछ ही काल बाद छोटी रानी सुमित्रा ने सम्राट् को जुड़वाँ पुत्रों से आनन्दित किया। इनका गुरुदेव ने नामकरण किया क्रमशः ‘लक्ष्मण’ और ‘शत्रुघ्न’।
समूचा कोशल उल्लास के सागर में डूब गया।
कहाँ तो सारी जवानी बीत गई, सारी प्रौढ़ावस्था भी लगभग बीत ही गयी नरक से तारने के लिये मात्र एक पुत्र की आकांक्षा में, पर पुत्र नहीं मिला और अब बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े दशरथ को, जब सामान्यतः संतान प्राप्ति की संभावनायें प्राकृतिक रूप से ही धूमिल हो जाती हैं तो एकाएक चार-चार पुत्र प्राप्त हो गये। राजा की प्रसन्नता का पारावार नहीं था। समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे अपने उल्लास को व्यक्त करें ! किसे क्या बाँट दें। होशियार अनुचरों की चाँदी थी आजकल, महाराज खुले हाथों से इनाम बाँट रहे थे, बस लेने वाले में महाराज को थोड़ा सा उकसाने की सामथ्र्य हो।
राजगुरु वशिष्ठ ने चारों कुमारों की जन्म-कुण्डलियाँ बनायीं और चारों को ही रघुकुल की कीर्तिपताका को और भी दीप्ति प्रदान करने वाला बताया।

अपने वायदे के अनुसार ही देवर्षि राजकुमारों के जन्म के कुछ ही दिन बाद उन्हें आशीष प्रदान करने आये और अपनी योजना का दूसरा बिंदु केकयी के कानों में फूँक गये। महाराज उस समय सभाभवन में थे। कुमारों के साथ महारानी कौशल्या, केकयी और सुमित्रा, तीनों महारानियाँ ही थीं।
‘‘महारानी आपके ये पुत्र साधारण नहीं हैं। यह ज्येष्ठ पुत्र ‘राम’ धरती से रक्ष-संस्कृति का समूल नाश करने वाला बनेगा। रावण आज जो लंका पर अपना राज्य स्थापित कर अपनी विजय यात्रा आरंभ कर रहा है, शीघ्र ही समूचे देवों और आर्यों के लिये बहुत बड़ा संकट बनने वाला है। राम देवों और आर्यों को इस रावण नाम के आतंक से मुक्ति दिलायेगा।’’
तीनों रानियों के चेहरे चमक उठे। केकयी तो प्रसन्नता के अतिरेक से बोल ही पड़ी -
‘‘आह ! देवर्षि आप नहीं जानते कि आपके इस कथन ने मेरे कलेजे को कितनी ठंडक पहुँचायी है।’’
‘‘मैं जानता हूँ महारानी कि रक्ष संस्कृति का पुनः अभ्युदय आपको कितना आघात पहुँचा रहा है।’’
‘‘रावण ! नीच-पातकी ! आर्य सभ्यता को पददलित करने वाला अघोरी ! उसका शिरोच्छेद ही मानवता के लिये शुभ होगा। यह कार्य हमारा राम करेगा जीजी ! मेरी छाती जुड़ा गयी।’’ कहती हुयी महारानी कैकेयी राजमहिषी की मर्यादा के बंधनों को और देवर्षि की उपस्थिति को भी भुलाकर कौशल्या के सीने से चिपट गयीं। फिर दोनों रानियों ने अपनी एक-एक बाँह फैलाकर सुमित्रा को भी आमंत्रित किया और तीनों रानियाँ प्रसन्न मन परस्पर आलिंगन में समा गयीं।
नारद हँसते हुये सोचने लगे कि अभी तो रावण ने किया ही क्या है। और आगे भी क्या करेगा। यदि आर्य संस्कृति के विनष्ट होने का भय न होता, यदि देवेन्द्र के सिंहासनच्युत होने का भय न होता तो संभवतः रावण से उत्तम कोई सम्राट् नहीं होता। रावण ने लंका का शासन सम्हालते ही जो व्यवस्थायें की थीं, नारद उनके कायल हो गये थे। काश ! रावण रक्ष संस्कृति को न अपनाता ? काश ! वह सुमाली के संरक्षकत्व में न जाकर अपने पिता के ही साथ रहा होता तो वह मनुष्यता को नयी परिभाषायें देने वाला बनता। पर तब संभवतः वह सम्राट् बनता ही नहीं। क्या पता वह ही अपने पिता और पितामह के समान जगत से निर्लिप्त सन्यासी बन जाता। एकान्त साधना करता। किसे पता है क्या होता ! जो हुआ वही होना था, विधि का विधान तो अटल होता है। खैर ... क्या सोच रहा हूँ मैं ? उन्होंने अपने विचार-प्रवाह को झटक दिया और वर्तमान में आते हुये बोले -
‘‘महारानी ! किंतु मैंने कुछ और भी कहा था आपसे। याद है न !’’ नारद ने इस हर्ष-प्रदर्शन को बाधा देते हुये कहा।
‘‘खूब याद है देवर्षि ! बताइये मुझे क्या बलिदान देना होगा इस उपलब्धि के लिये। कैकेयी प्रत्येक त्याग के लिये प्रस्तुत है।’’
‘‘रावण शीघ्र ही त्रिलोक की महाशक्ति बनने वाला है। ब्रह्मा से संबंधो के चलते विष्णु भी जिसका सामना करने से निश्चय ही कतरा जायेंगे। ऐसे रावण को परास्त करना कोई खेल नहीं होगा।’’
‘‘मुनिवर ! आप जो इतना उद्योग कर रहे हैं वह यूँ ही तो नहीं होगा। आपने कोई न कोई मार्ग तो देखा ही होगा।’’ कैकेयी हँसती हुई बोली।
‘‘रावण को धोखे में रखकर ही परास्त किया जा सकेगा।’’
‘‘क्या तात्पर्य है आपका - छल से ?’’
‘‘उसका भी सहारा लेना पड़ सकता है। किंतु अभी मेरा आशय छल से नहीं है।’’
‘‘तो फिर ?’’
‘‘रावण ने यदि आपकी शक्ति का आकलन कर लिया तो फिर उसे पराजित नहीं किया जा सकेगा। वह स्वयं में अत्यंत सामथ्र्यवान है - केवल शारीरिक और सामरिक शक्ति से ही नहीं, मानसिक और आत्मिक शक्ति से भी। पहले सुमाली ने और फिर ब्रह्मा ने उसे विश्व के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में ढाला है। फिर माल्यवान और सुमाली की कूटनीति उसके साथ पहले ही है।’’
‘‘कहना क्या चाहते हैं मुनिवर ?’’
‘‘अभी से उकताइये मत महारानी ! अभी और भी है ... आपके राम को इस अभियान में एकाकी जाना होगा, ससैन्य नहीं।’’
‘‘एकाकी ??? ..’’. कैकेयी की आँखें आश्चर्य से फैल गयीं ‘‘ऐसा क्यों ?’’
‘‘महारानी ! आप जामदग्नि परशुराम को क्यों भूल रही हैं। रावण भले ही रक्ष संस्कृति का समर्थन करता है किंतु वह ब्राह्मण है और आप क्षत्रिय। जामदग्नि को क्षत्रियों से घृणा की हद तक वैमनस्य है क्या आप जानती नहीं ? ऐसे में यदि ससैन्य आक्रमण किया ... किसी भी क्षत्रिय सम्राट ने रावण पर, तो आप क्या सोचती हैं जामदग्नि चुपचाप बैठे देखते रहेंगे ?’’
‘‘हे ईश्वर ! यह तो सच है।’’ तीनों रानियों के चेहरे पर भय सा फैल गया। - ‘‘जामदग्नि तो स्वयं ही दुर्धर्ष हैं। उनके नाम से ही क्षत्रिय काँपने लगते हैं।’’
‘‘और सुनिये महारानी ! क्या आप वानर सम्राट् बालि की सामथ्र्य को नहीं जानतीं। आर्य उनकी संस्कृति को कैसी हेय दृष्टि से देखते हैं, यह क्या आपको पता नहीं ? दूसरी ओर रक्ष संस्कृति में वे बड़ी सहजता से खप सकते हैं। आपको क्या लगता है कि वे किधर होंगे ?’’
‘‘मुनिवर ...’’
‘‘अभी और रुकिये, अभी तो हैहयराज का जिक्र बाकी ही है ...’’
‘‘मुनिवर आप तो डरा रहे हैं।’’ नारद की बात काटती हुई कौशल्या बोल पड़ी - ‘‘और उसके बाद भी कहते हैं कि राम को अकेले जाना होगा इस अभियान पर ... नाजुक सा राम, कैसे कर पायेगा सामना इन विकट शक्तियों का ?’’
‘‘राम क्या ऐसा ही नाजुक सा बना रहेगा ? वह अभियान पर जायेगा तब तक स्वयं एक सर्वश्रेष्ठ शक्ति के रूप में विकसित हो चुका होगा।’’
‘‘फिर भी मुनिवर ! एकाकी राम इन विकट शक्तियों से कैसे निपट पायेगा ? जानते-बूझते आप उसे आग में धकेलने का आयोजन कर रहे हैं !’’ कौशल्या की शंका मिट नहीं रही थी।
‘‘राम जायेगा समर पर और देवगण बैठे आनंद से तमाशा देखेंगे, यही कहना चाहते हैं न मुनिवर आप ?’’ कैकेयी के स्वर में रोष था।’’
‘‘नहीं महारानी ! युद्ध काल में तो देवगण छुटपुछ सहायता के अतिरिक्त तमाशा ही देखेंगे किंतु वे राम के अभियान के लिये भूमि बनाने के लिये जुट चुके हैं। जब तक राम-रावण के संग्राम की स्थिति आयेगी देव इतनी व्यवस्था कर चुके होंगे कि ये सारी शक्तियाँ राम के पक्ष में खड़ी हों। राम के पक्ष में न भी हों तो रावण के पक्ष में तो कतई न हों। वानर शक्ति तो निस्संदेह तब तक राम के पक्ष में जुड़ जायेगी। वही राम के लिये सैन्य का काम करेगी। लंका में यहाँ की सैन्य शक्ति से निस्संदेह वानर सैन्य अधिक कारगर रहेगा, यह तो आप भी समझ सकती हैं।’’
‘‘फिर भी देवर्षि ! ससैन्य अभियान में क्या हर्ज है ? अकेले राम क्या कर पायेगा ? अवध, कोशल, कैकेय, काशी की सेनायें तो होंगी ही होंगी, अन्य मित्र राष्ट्रों का भी सहयोग प्राप्त करना कठिन नहीं होगा। वानर सैन्य के साथ यह भी होंगे तो क्या बेहतर नहीं होगा ?’’
‘‘नहीं महारानी ! ससैन्य अभियान से सर्वनाश के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होगा। इस विषय में तो सोचें ही मत।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘प्रथमतः रावण के विरुद्ध अभियान के लिये स्वयं महाराज दशरथ ही अनुमति नहीं देंगे। आप तो जानती ही हैं कि वे रावण से कितने भयभीत हैं।’’
‘‘आप सत्य कह रहे हैं। महाराज रावण से भयभीत हैं किंतु जब हम सब का सम्मिलित प्रयास होगा तो वे अवश्य अभियान की अनुमति देंगे। नहीं देंगे तो मैं रण के लिये अपने राम के साथ ससैन्य प्रस्तुत रहूँगी। मुझे महाराज किसी भी प्रकार रोक नहीं पायेंगे।’’ कैकेयी ने पुनः वार्तालाप में हस्तक्षेप किया।
‘‘आगे-आगे मत चलिये महारानी। सारे तथ्यों को देखिये तो पहले।’’
‘‘अच्छा बताइये!’’
‘‘फिर उस स्थिति में परशुराम निश्चित ही रावण के पक्ष में खड़े हो जायेंगे!’’
कैकेयी मौन नारद का मुख निहारती रहीं तो नारद आगे बोले -
‘‘अभियान के लिये सेना के यहाँ से प्रस्थान करते ही जामदग्नि वहाँ रावण के साथ आपको रण हेतु सन्नद्ध मिलेंगे। कौन सम्राट् मुकाबला कर पायेगा उनका ?’’
‘‘तर्कपूर्ण है आपका कथन। आवेश में इस तथ्य का भान ही नहीं रहा हमें।’’
‘‘फिर महारानी बालि और केसरी भी हैं दक्षिणवर्त में। यहाँ से सैन्य के प्रस्थान के साथ ही वे भी रावण के पक्ष में खड़े हो जायेंगे। हो सकता है पहले ही उन्हें लगे कि यह सैन्य अभियान उनके विरुद्ध है और वे दण्डकारण्य में ही हम पर आक्रमण कर दें। हमारा सैनिकों ने तो कभी उस क्षेत्र में कदम ही नहीं रखे होंगे, वे वहाँ की धरातलीय और सामरिक परिस्थितियों से पूर्णतः अनभिज्ञ होंगे, बालि और केसरी बड़ी आसानी से आपके सैन्य को धराशायी कर देंगे और रावण का पराभव बस सोचने की ही बात रह जायेगा। बड़ा भीषण इलाका है दण्डकारण्य का।’’
‘‘आप तो मुनिवर पूर्ण अंधकारमय चित्र खींच रहे हैं। इन परिस्थितियों में राम क्या कर पायेगा। आप कहते हैं उसीके हाथों रावण का नाश निश्चित है।’’
‘‘गलत नहीं कहता महारानियों ! उसकी कुंडली में यह यश स्पष्ट परिलक्षित है। किंतु यह कार्य राम ससैन्य नहीं कर सकता। अपितु इसे ... यों समझें इस कार्य को वह क्षत्रिय आर्य सम्राटों की सेना के साथ नहीं कर सकता।’’
‘‘फिर ???’’
‘‘उसे अपनी सेना का गठन वहाँ स्वयं करना होगा।’’
‘‘कहाँ से ? सारे मार्ग तो आप स्वयं बंद किये दे रहे हैं। कहाँ से गठन करेगा वह सैन्य का ?’’
‘‘वहीं दक्षिणवर्त के वानरों और ऋक्षों से।’’
‘‘वानरों और ऋक्षों से !! उपहास कर रहे हैं मुनिवर ! एक ओर आप कह रहे हैं कि वे हमारी अपेक्षा सहज रूप से रावण के मित्र बन जायेंगे दूसरी ओर कह रहे हैं कि राम को उनका सैन्य गठित करना होगा। कैसे संभव हो सकेगा यह ?’’
‘‘होगा महारानी होगा। यह प्रयास सफल हो कर रहेगा। शीघ्र ही आपको इसकी सूचना मिल जायेगी। देव और कर क्या रहे हैं दक्षिणापथ में !’’ नारद ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा।
‘‘किंतु कैसे मुनिवर ?’’
‘‘बस देखती जाइये महारानी। समय आने पर आपको स्वयं पता चल जायेगा।’’
‘‘चलिये मान ली आपकी बात। किंतु फिर भी ...’’
कोई किंतु नहीं महारानी।’’ नारद उनकी बात काटते हुये बोले- ‘‘अगस्त्य आदि ब्रह्मर्षि अकारण ही नहीं दक्षिणावर्त में बसे हैं जाकर।’’
‘‘हूँ !!!’’ तीनों रानियांे के मुँह से अनायास हुंकारी निकली। नारद ने बोलना जारी रखा -
‘‘इस अभियान का नेतृत्व मात्र राम करेगा। शेष तो यह रण ब्राह्मण रावणादि और उसकी अनार्य प्रजा के साथ अगस्त्यादि ब्राह्मणों और कपि-ऋक्ष आदि अनार्य जातियों का युद्ध होगा। क्षत्रिय इसमें मूक ही रहेंगे।’’
‘‘और देव ? वे भी केवल भूमिका ही बनायेंगे ?’’
इस बार नारद किंचित हँसे फिर बोले -
‘‘सच कह रही हैं महारानी। ब्रह्मा के वचनों के चलते देव प्रत्यक्ष युद्ध में भाग नहीं ले सकते, फिर भी वे आपको पूरा रण सजा कर देंगे। अपनी कूटनीति से सारी परिस्थितियों को वे ही तो नियंत्रण करेंगे।’’
‘‘स्पष्ट कहें मुनिवर ! वे आग लगाकर दूर से हाथ सेकेंगे।’’
‘‘महारानी अकारण देवों पर आरोप लगा रही हैं !’’
‘‘अकारण क्यों ? क्या प्रत्येक देवासुर संग्राम में आर्य सम्राट् देवों के साथ असुरों से नहीं लड़े क्या स्वयं कैकेयी संग्राम में महाराज दशरथ के साथ रणरत नहीं हुई ?’’ महारानी कैकेयी अब आवेश में आने लगी थीं। उनकी आवाज स्वतः ऊँची हो गयी किंतु नारद वैसे ही शांत थे। वे बोले -
‘‘बिलकुल ! किंतु इस संग्राम में आर्य सम्राट् कोई पक्ष कहाँ होंगे महारानी ? आप तो इस संग्राम में देवों से भी अधिक निष्क्रिय भूमिका अदा करेंगे। देव तो परोक्ष रूप से पूरी तरह राम के सहायक रहेंगे किंतु आर्य सम्राट् तो पूर्णतः मूक दर्शक मात्र रहेंगे।’’
‘‘ऐसा कैसे संभव है ? राम जब घोर रण में होंगे तो उसके पिता, मातुल आदि निष्क्रिय कैसे रह सकते हैं ? अपने बच्चे को काल के जबड़ों में छोड़कर दूर से देखते नहीं रहा जा सकता।’’
‘‘न ! न ! महारानी ! पहले भी चेता चुका हूँ। यह अनर्थ कदापि न कर बैठें आप लोग, अन्यथा सर्वनाश के सिवा कुछ हाथ नहीं आने वाला। राम पर, ऋषियों पर और देवों की योजना पर भरोसा रखें। राम विजयी हो कर रहेंगे। रक्ष वंश का समूल नाश होकर रहेगा। जो काम माल्यवान और सुमाली को छोड़ कर विष्णु ने अधूरा छोड़ दिया था उसे अब विष्णु की पे्ररणा से ही राम पूरा करेंगे।’’
‘‘वाग्जाल न फैलायें मुनिवर ! मान क्यों नहीं लेते कि देवगण रावण से भयभीत हैं।’’
‘‘सत्य है कि देवगण भयभीत हैं किंतु रावण की शक्ति से नहीं अपितु ब्रह्मा के वचन से।’’
कुछ क्षण रुक कर नारद पुनः बोले -
‘‘एक सूचना दूँ आपको महारानी, शायद आपको अभी ज्ञात न हो।’’
‘‘दीजिये।’’
‘‘शीघ्र ही आपको सूचना मिलेगी कि रावण के समक्ष देव पराजित हो गये। देवों को पराजय स्वीकार करनी ही होगी।’’
‘‘क्या ? देव स्वतः पराजय स्वीकार कर लेंगे ?’’
‘‘हाँ ! अन्यथा ब्रह्मा बीच में आ जायेंगे और तब पराजय स्वीकार करनी होगी।’’
‘‘लेकिन कर क्या रहे हैं देव ? आप तब से कह रहे हैं कि देव भूमिका तैयार कर रहे हैं किंतु कैसे इस विषय में कुछ नहीं कह रहे।’’
‘‘वह कहने का समय अभी नहीं आया। आप लोग भी इस विषय में मौन ही रहें। बस यह जान लें कि यह किसी को ज्ञात नहीं और ज्ञात होने भी नहीं दिया जायेगा। ’’
‘‘फिर भी मुनिवर ! कुछ तो संकेत दें !’’
‘‘आर्यों में, क्षत्रियों में मात्र आपकी भूमिका रहेगी इस सम्पूर्ण अभियान में। महारानी कौशल्या और महारानी सुमित्रा आपकी मौन सहयोगी होंगी।’’
कैकेयी कुछ मौन रहीं। धीरे-धीरे उनके चेहरे का तनाव कम हुआ जो इस लम्बे वार्तालाप में उत्तेजनावश आ गया था। फिर हँसते हुये बोलीं -
‘‘मेरे प्रश्न को घुमा गये मुनिवर !’’
नारद भी हँसे -
‘‘अभी यही उचित है महारानी ! अपनी भूमिका नहीं समझियेगा, उसी पर तो सारी सफलता निर्भर है !’’
‘‘बताइये !’’
‘‘आपको राम को एकाकी वन भेजना होगा, महाराज की जानकारी में यह आये बगैर कि सारी योजना क्या है। अगर कहीं महाराज को तनिक भी संदेह हो गया तो कुछ भी हो जाये वे राम को एकाकी वन नहीं जाने देंगे।’’
‘‘किंतु यह कैसे होगा ? कैसे मैं क्रूर हो पाऊँगी राम के प्रति ? आप ही तो कहकर गये हैं पूर्व में कि राम पर मेरा विशेष स्नेह होगा।’’
‘‘हृदय पर पत्थर रखकर यह तो करना ही होगा महारानी। यह बलिदान तो देना ही होगा।’’
‘‘ठीक है। जैसी आपकी आज्ञा।’’
‘‘आज्ञा नहीं महारानी ! हम सब विधाता के रचे रंगमंच पर अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वाह कर रहे हैं। मैं भी कर रहा हूँ, आपको भी करना होगा।’’
‘‘पर कैसे करूँगी आखिर यह ?’’
‘‘उसके लिये अभी विचार किया जा रहा है। आप भी विचार कीजिये। मैं आपके सम्पर्क में रहूँगा।’’


क्रमशः


मौलिक एवं अप्रकाशित


- सुलभ अग्निहोत्री

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Comment by Saurabh Pandey on July 20, 2016 at 12:32am

यहाँ तो पूर्वाभास के स्थान पर पूरी कथा ही खुल कर आ अगयी ! अच्छी गति है अभी. 

शुभ-शुभ

कृपया ध्यान दे...

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