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राम-रावण कथा (पूर्व पीठिका) 23

कल से आगे ...


‘‘महर्षि प्रणाम स्वीकार करें।’’ महर्षि अगस्त्य के आश्रम में प्रवेश करते हुये इंद्र ने कहा।
‘‘देवेंद्र को क्या आशीर्वाद दूँ मैं ?’’ अगस्त्य ने हँसते हुये कहा ‘‘देवेन्द्र के सौभाग्य से तो सारा विश्व पहले ही ईष्र्या करता है।’’
‘‘क्या गजब करते हैं मुनिवर ! इस समय तो इंद्र को आपके आशीर्वाद की सर्वाधिक आवश्यकता है। इस समय यह कृपणता, दया करें, इस समय भरपूर आशीर्वाद दें।’’
‘‘ महर्षि गौतम के साथ ऐसा घात करने के बाद भी जो विश्व में पूजनीय है भला उसे अगस्त्य के आशीर्वाद से क्या अन्तर पढ़ता है !’’ अगस्त्य ने कटाक्ष करते हुये चुटकी ली।
‘‘महर्षि क्यों लज्जित करते हैं ?’’ इंद्र ने संकुचित होते हुये कहा - ‘‘क्या इस अपराध के लिये मुनिवर इंद्र को क्षमा नहीं करेंगे ?’’
‘‘क्षमा ? अगस्त्य कौन होता है आपको क्षमा करने वाला देवेन्द्र ! क्षमा का प्रश्न तो तब उठता जब पहले दंड का विधान हुआ होता। त्रिलोक में ऐसा कौन है जो आपको दण्ड देने का विचार कर सके। आप तो निष्कंटक विहार कीजिये, जीवन का आनंद लीजिये।’’
‘‘गुरुदेव ! अब और वाक्प्रहार मत कीजिये न ! कहा न इन्द्र अत्यंत लज्जित है।’’
‘‘सच में ?’’ अगस्त्य ने हँसते हुये पूछा।
‘‘जी ! सच में !’’
‘‘चलो तो - निष्कंटक भव, विजयी भव !’’ अगस्त्य पूर्ववत हँसते हुये आशीर्वाद दिया ‘‘प्रसन्न देवराज ?’’
नारद की योजना पर अमल आरंभ हो गया था। समूचे दक्षिणापथ में धीरे-धीरे आश्रमों की स्थापना का कार्य आरंभ हो गया था। इन सारे अभियान का नेतृत्व कर रहे थे महर्षि अगस्त्य। महर्षि अगस्त्य का कुल भी देवों की कृपा प्राप्त ऋषि-कुलों में से एक था। किंवदंतियों के अनुसार कभी विन्ध्य पर्वत इतना ऊँचा था कि इसे अलंघ्य माना जाता था। महर्षि अगस्त देवों की योजनानुसार जब कपि-ऋक्षों को संगठित करने के उद्देश्य से यहाँ पहुँचे तो विन्ध्य उन्हें सम्मान देने के लिये झुक गया। अगस्त्य ने पर्वत को आदेश दिया कि जब तक मैं वापस लौट कर न आऊँ तब तक इसी प्रकार झुके रहना। तभी से अनके आदेश का पालन करता हुआ विन्ध्य आज तक झुका बैठा है। अगस्त्य जो एक बार दक्षिणापथ की ओर गये तो फिर कभी वापस लौटे ही नहीं, वहीं के होकर रह गये और विन्ध्य आज भी उनकी वापसी की प्रतीक्षा में झुका बैठा है।
यह तो किंवदंती है। वास्तविकता में तो अगस्त्य ने उस काल तक अलंघ्य मानी जाती दुर्गम पर्वत-उपत्यकाओं मंे से विन्ध्य को पार करने का मार्ग खोज लिया था और उसी मार्ग से उसे पार कर गये थे। तमिलभाषी मानते हैं कि उनकी भाषा का व्याकरण महर्षि अगस्त्य ने ही तैयार किया था। यह इस बात का भी प्रमाण है कि अगस्त्य ने उत्तर और दक्षिण की खाई पाटने के लिये कितना महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने न सिर्फ दक्षिण में संस्कृत का प्रसार किया बल्कि दक्षिण की भाषाओं को सीखा, समझा और उन्हें व्यवस्थित भी किया।
इस समय इंद्र उसी आयोजन की प्रगति का जायजा लेने आये हुये थे। उनका विमान विशाल आश्रम के बाहर खड़ा था।
‘‘महर्षि कोई असुविधा तो नहीं हो रही कार्य संचालन में ?’’
‘‘कैसी असुविधा ? देवेंद्र हम ऋषियों के शरीर तो कष्टों के सहचर होते हैं। असुविधायें हमारी सहचरी होती हैं। आप बताइये यात्रा में कोई कष्ट तो नहीं हुआ ?’’
‘‘ठिठोली कर रहे हैं महर्षि !’’
‘‘अरे नहीं ! देवेंद्र, भला मैं आपसे ठिठोली क्यों करूँगा। इतना अवकाश कहाँ है जीवन में कि ठिठोली कर सकूँ।’’
‘‘मुनिवर ! वानर कोई प्रतिरोध तो उत्पन्न नहीं कर रहे ?’’
‘‘देवेन्द्र ! ये वानर बड़े सहज प्राणी हैं। ये प्रतिरोध तभी करते हैं जब इन्हें अविश्वास होता है या भय होता है। हम इनके सामने ऐसा कोई कारण ही क्यों उपस्थित करें जिससे इन्हें हमारे ऊपर अविश्वास हो या हमसे भय हो ?’’
उस काल में इस पूरे क्षेत्र में नगरीय सभ्यता का प्रसार नहीं हुआ था। नारद की योजना के अनुसार वनवासी कबीलों वानर, रीछ आदि में घुसपैठ कर उन्हें अपने प्रभाव में लेने का कार्य गुप्त रूप से सम्पादित किया जा रहा था। ये जनजातियाँ अर्धविकसित अवश्य थीं किंतु मेधा और शारीरिक शक्ति में आर्यों से कमतर नहीं थीं। इन्हें वानर और रीछ जैसे पशुओं के नामों से क्यों सम्बोधित किया गया, इस विषय में मैं प्रमाण पूर्वक कुछ नहीं कह सकता किंतु जो प्रमाण कहते हैं उनके अनुसार भारत में सबसे प्राचीन जो मानव अवशेष पाया गया है वह किसी नीग्रो वंश का है। लगभग 90 हजार साल प्राचीन यह अवशेष केरल में पाया गया है। यह प्रमाणित करता है कि आज बेशक भारत में नीग्रो जाति के लोग नहीं हैं किन्तु किसी काल में दक्षिण भारत में वे अवश्य बहुतायत में रहे होंगे। इनका वंश भारत में कैसे समाप्त हुआ इस विषय में कुछ भी प्रमाण पूर्वक कहना संभव नहीं है।
ऐसे में आर्य जाति जो गौर वर्ण और सौंदर्य में विश्व में सिरमौर मानी गयी है अगर नीग्रो जाति को वानर या रीछ की संज्ञा दे दे तो उसमें अचंभे की कोई बात नहीं। उस पर भी तब, जब आर्य जाति सम्पूर्ण भारत में विजेता के तौर पर स्थापित रही हो। सभ्यता और संस्कृति के उत्कर्ष में भी आर्य जाति इन्हें अपने सामने बहुत पिछड़ा हुआ ही मानती थी। किंतु इस समय परिस्थितियों को प्रणाम करना आवश्यक था। देवों को इस समय इन्हीं वनवासियों का आसरा था, इसलिये इन्हें अपने साथ जोड़ना ही था।
‘‘मुनिवर सफलता मिलेगी हमें ?’’
‘‘क्यों ? न मिलने का क्या कारण है ?’’
‘‘भगवती लोपामुद्रा तो असंतुष्ट नहीं हैं हम देवों से कि हमने उनसे मनु महाराज के आदेशों का उल्लंघन करवा दिया ?’’
‘‘देवेंद्र ! आप भगवती को क्या समझते हैं ? वे मंत्रदृष्टा हैं। वेदों की रचना में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। मनु महाराज के आदेश आम आर्यों के लिये थे ताकि आर्य संस्कृति कहीं विकृत न हो जाये। हम तो इन आदिवासियों में अपनी संस्कृति के बीज बोने आये हैं। हम तो यह सिद्ध करने आये हैं कि अब मनु महाराज का आदेश अप्रासंगिक हो गया है। आर्य यदि विंध्य के उत्तर में ही बने रहे तो यह सारा भूभाग रक्ष संस्कृति की बाढ़ से आप्लावित हो जायेगा और फिर रावण को देर नहीं लगेगी आर्य संस्कृति का मूलोच्छेद करने में।’’
‘‘सही कह रहे हैं आप।’’
‘‘अरे देवेंद्र ! आप कब आये पता ही नहीं चला ?’’ यह भगवती लोपामुद्रा, महर्षि अगस्त्य की पत्नी, का कंठस्वर था।
‘‘अभी आया हूँ भगवती !‘‘ इंद्र ने झुक कर उन्हें प्रणाम करते हुये कहा। ‘‘आप लोग देव कार्य से यहाँ इस बीहड़ में पड़े हुये हैं तो देवों का भी दायित्व बनता है कि आपकी सुविधा की सुधि लेते रहें।
‘‘चापलूसी मत करो इंद्र !’’ देवी वात्सल्य पूर्ण हास्य से बोलीं।
इंद्र और अगस्त्य भी हँस दिये।
‘‘अरी मुद्रिके ! देख देवेन्द्र आये हैं, कुछ व्यवस्था कर।’’ अपने पीठ पर बिखरे गीले बालों का सिर पर जूड़ा सा बनाते हुये देवी ने जोर से आश्रम के पीछे की ओर आवाज दी।
‘‘जी देवी !’’ प्रति उत्तर आया।
‘‘देवेन्द्र एक-दो वर्ष हमें इनके बीच पैठ बनाने दीजिये। इन्हें हमसे मित्रवत होने दीजिये फिर आप लोग यहाँ हमारे गुरुकुलों में युद्ध विद्या का प्रशिक्षण आरंभ कर दीजिये। आपका नायक तो अवतरित हो ही चुका है।’’
‘‘जैसी आज्ञा देवी की। हम तो बस आपके संकेत की प्रतीक्षा में हैं। जैसे ही आप इंगित करेंगी, हम लोग अपना कार्य आरंभ कर देंगे।’’
‘‘नारद वास्तव में अत्यंत दूरदर्शी हैं। रक्ष संस्कृति की काट आर्य संस्कृति नहीं यह वानर संस्कृति ही हो सकती है।’’ अगस्तय ने नारद की प्रशंसा करते हुये कहा।
‘‘जी मुनिवर ! इन्हें आर्य संस्कृति में दीक्षित करना कब से आरंभ करना है ?’’ इंद्र बोले।
‘‘गलत सोच रहे हैं देवेन्द्र। ऐसा कोई भी प्रयास नहीं करना है हमें। जैसे हमें आर्य संस्कृति प्यारी है, वैसे ही सबको अपनी संस्कृति प्यारी होती है। इन वानरों के साथ भी ऐसा ही है। यदि आपने इन्हें आर्य संस्कृति में दीक्षित करना आरंभ किया तो आप आर्यों की संख्या में थोड़ी से अभिवृद्धि अवश्य कर लेंगे किंतु शेष वानरों को अपना शत्रु बना लेंगे। हम ऐसा नहीं कर सकते। फिर आप इन्हें ब्राह्मण या क्षत्रिय के रूप में तो स्वीकार करेंगे नहीं। आर्यावर्त में शूद्रों को अपनी निम्न स्थिति से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि उन्होंने इसे अपने पूर्व जन्म का फल मान कर स्वीकार कर लिया है। साथ ही उन्हें वर्ण व्यवस्था से रहित किसी दूसरी संस्कृति का भान ही नहीं है। वे यह सोच ही नहीं सकते कि समस्त नागरिक समान भी हो सकते हैं। इसके विपरीत ये वानर तो समानता की संस्कृति में जी रहे हैं ये अपनी निम्न स्थिति स्वीकार नहीं कर पायेंगे, थोड़े ही दिन में विद्रोह कर देंगे। फिर आप वापस जहाँ से चले थे वहीं आ जायेंगे बल्कि उससे भी बुरी स्थिति में होंगे।’’
‘‘फिर क्या करेंगे हम ?’’
‘‘हम वे जहाँ हैं, जैसे हैं उसी स्थिति में निर्मल मन से, सेवा भाव से उनके दैनिक जीवन की आवश्यकताओं में, उनकी हारी-बीमारी में उनकी सहायता करेंगे। उन्हें बेहतर जीवन देने का प्रयास करेंगे, तभी वे हम पर विश्वास कर पायेंगे।’’
‘‘जैसा आप उचित समझें !’’ इंद्र ने हथियार डाल दिये।
‘‘देवेंद्र ! मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है किंतु रावण से मेरा विरोध इसलिये नहीं है कि वह किसी दूसरी संस्कृति का पोषक है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सोच होती है, प्रत्येक संस्कृति की अपनी विचारधारा होती है। हमें अपनी सोच, अपनी विचारधारा दूसरे पर थोपने का कोई अधिकार नहीं है। इसी तरह से दूसरे को भी अपनी सोच, अपनी विचारधारा हम पर थोपने का कोई अधिकार नहीं है। फिर भी मेरा अपना मानना है कि कुछ भी उत्तम जहाँ से भी मिले ग्रहण करना चाहिये। रावण देवेन्द्र का सिंहासन कल छीनता हो, आज छीन ले अगस्त्य की बला से।’’
‘‘क्या कह रहे हैं मुनिवर ????’’ इंद्र एकदम घबरा कर बोल पड़े।
‘‘बीच में मत बोलें ..‘‘ अगस्त्य ने उन्हें हाथ के इशारे से रोकते हुये कहा- ‘‘मेरा रावण से विरोध इसलिये नहीं है कि वह कल इंद्र के सिंहासन पर अधिकार कर लेगा। वह इस योग्य है। मेरा उससे विरोध इसलिये है कि उसके पीछे सुमाली जैसा व्यक्ति है। उसने रावण के भीतर अपनी सोच ठोंक-ठोंक कर भर दी होगी। वह कल अवश्य अपनी सोच हमारे ऊपर आरोपित करने का प्रयास करेगा। रावण यदि नहीं करेगा तो सुमाली उससे करवायेगा। मैं न तो किसी के ऊपर अपनी संस्कृति, अपने संस्कार थोपने का पक्षधर हूँ और न ही किसी को अपने ऊपर कुछ थोपने का अधिकार दे सकता हूँ। हाँ जिसे मैं उत्तम और श्रेष्ठ समझूँगा उसे अपने मन से स्वीकार करूँगा। उसे ग्रहण करने में विलंब नहीं करूँगा।’’
इंद्र ने राहत की सांस ली। तभी मुद्रिका एक डलिया में फल लेकर आ गयी। उसे आता देख कर अगस्त्य चुप हो गये थे। उनका चेहरा निर्विकार था।
‘‘यहीं रख दूँ माता ?’’ उसने पूछा।
‘‘हाँ ! हाँ ! रख दे।’’
‘‘लीजिये देवेन्द्र ! प्राप्त कीजिये !’’ अगस्त्य ने कहा।
‘‘पहले आप और देवी ग्रहण करें।’’
‘‘ले, पहले तू ले मुद्रिके !’’ लोपामुद्रा ने एक फल उठा कर देते हुये कहा। ‘‘अरी बैठ जा तू भी, खड़ी क्यों है ?’’
मुद्रिका तकरीबन 14 वर्ष की साँवली सी लम्बे कद की बालिका थी। वक्ष से लेकर जाँघों तक मृगछाला पहने थी। वह बैठ गयी तो उसके सर पर प्यार से हाथ फेरती हुयी लोपामुद्रा बोलीं -
‘‘देवेन्द्र ! यह मेरी सबसे प्यारी सखी है, मुद्रिका।’’ मुद्रिका सकुचा कर लोपामुद्रा के पीछे छिपने लगी।
‘‘अरी क्या करती है ? देवेन्द्र को प्रणाम तो कर !’’
मुद्रिका ने यंत्रचालित से हाथ जोड़ दिये। उसका सिर संकोच से छाती पर झुका जा रहा था। उसकी मुद्रा पर सब हँस दिये। वह और लजा गयी।
सबने फल छीलना आरंभ कर दिया तो अगस्त्य ने मुद्रिका से पूछा -
‘‘पुत्री ! तेरी बहन की तबीयत कैसी है अब ? औषधि से लाभ हुआ ?’’
‘‘जी गुरुदेव ! बहुत लाभ हुआ। मैं अभी आई तो वह मस्त खेल रही थी। दो वर्ष पूर्व मेरे भइया को भी ऐसा ही ज्वर हुआ था तो वह तो जान से ही चला गया था। और आपकी औषधि ने तो एक दिन में ही चमत्कार कर दिया।’’ संकोच के बावजूद मुद्रिका ने बड़े उत्साह से आँखें गोल करके उत्तर दिया।
‘‘तो जाते समय और औषधि लिये जाना। बस वह बिलकुल ठीक हो जायेगी।’’
‘‘जी गुरुदेव।’’
‘‘और मैंने तुम्हें कल कुछ वनस्पतियाँ दिखाई थीं, उनके गुण-धर्म बताये थे। याद हैं या भूल गई ?’’
‘‘भूल कैसे जाऊँगी - याद हैं। सुनाऊ ..?’’ मुद्रिका ने गर्व से कहा। उसका संकोच कुछ कम हो गया था।
‘‘नहीं ! नहीं ! मैंने मान लिया तुझे याद है।’’ अगस्त्य ने प्यार से कहा।
‘‘अच्छा मुनिवर आज्ञा दीजिये। कोई भी आवश्यकता हो इंगित कर दीजियेगा।’’ इंद्र ने अगस्त्य और लोपामुद्रा दोनों की चरणरज लेते हुये कहा। दोनों ने सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया। फिर इंद्र ने मुद्रिका की ओर देखा। उसने फौरन हाथ जोड़ दिये ‘‘प्रणाम देवेंद्र।’’
‘‘आशीर्वाद बेटा। खूब प्रसन्न रहो।’’ इंद्र ने भी प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुये कहा।
इंद्र बाहर निकल गये। उनके साथ अगस्त्य भी विदा करते हुये निकल गये। अकेले में मुद्रिका ने लोपामुद्रा से पूछा -
‘‘माता ये वही देवेंद्र थे ना जो स्वर्ग के राजा हैं।’’
‘‘हाँ बेटा।’’
‘‘लेकिन माता ये तो वैसे नहीं हैं ?’’
‘‘कैसे नहीं हैं ?’’
‘‘वैसे ही जैसा लोग कहते हैं।’’
‘‘अरी कैसा कहते हैं लोग, सीधे-सीधे बोल ना, बात को खींच क्यों रही है ?’’ लोपामुद्रा ने खुलकर हँसते हुये कहा।
‘‘लोग कहते हैं कि ... कि ... कि देवेंद्र तो बड़े क्रोधी हैं, बड़े दुष्ट हैं, किसी का सम्मान नहीं करते।’’
‘‘वे लोग कभी मिले हैं देवेंद्र से ?’’
‘‘नहीं माता !’’
‘‘तू तो आज मिल ली, तुझे कैसे लगे ?’’
‘‘मुझे तो अच्छे लगे।’’ मुद्रिका पूर्ववत उत्साह से बोली।
‘‘तो बस ! तू उन्हें अच्छा मान। जो उनसे मिले ही नहीं वे क्या जानें !’’
मुद्रिका सहमति में सिर हिलाने लगी थी।


क्रमशः

मौलिक एवं अप्रकाशित

- सुलभ अग्निहोत्री

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Comment

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Comment by Saurabh Pandey on July 22, 2016 at 1:08am

अद्भुत ! 

एक-एक कर कड़ियाँ देखता-पढ़ता बढ़्ता जा रहा हूँ..

शुभ-शुभ

Comment by Sulabh Agnihotri on July 19, 2016 at 9:16am

रवि शुक्ला जी !
प्रशंसा के लिये आभार!
अभी तो यह लेखन के क्रम में ही है। प्रथम भाग पूर्ण हो चुका है, दूसरा चल रहा है।
यहाँ तक का कथानक आप यही मेरे ब्लाग्स में क्रम से देख सकते हैं। कृपया एक बार सारे देख डालिये फिर अपनी सम्मति दीजिये।
पुस्तकाकार प्रकाशन संभवतः अगले वर्ष ही संभव हो सकेगा। अभी तो इसे कच्चा माल समझ लीजिये, अभी इसमें भाषा संबंधी बहुत संशोधनों की आवश्यकता है, कथ्य संबंधी विषयों पर भी आप सब सुधी मित्रों के परामर्श के अनुसार कार्य किया जायेगा।

Comment by Ravi Shukla on July 18, 2016 at 5:19pm

आदरणीय सुलभ जी बहुत ही सुदर वर्णन हमारी रुचि के अनुकूल विषय है पर इसे हमने इसी भाग से पढ़ा हैै । आपसेे जानने की जिज्ञासा है कि ये कथा प्रिंंट मीडिया में भ्‍ाी उपलब्‍ध है क्‍या जिससे पूरा उपन्‍यास पढ़ने के साथ संकलित भी करके रखा जा सके । साादर 

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