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"शह और शिकस्त" - [लघुकथा] 25 (शतरंज संदर्भित) - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"शह और शिकस्त" - (लघुकथा)

दोनों अलमारी में बहुत ही गोपनीय तरीके से रखे गए थे कई आवरणों से लपेट कर पैकेटों में। काले धन का पैकेट और कंडोम का पैकेट।

"आख़िर तुम गलकर सड़ ही गये न ! उत्पत्ति को रोकने के लिए किसने किया तुम्हारा उपयोग "- काले धन ने कहा।

"सच कहते हो" - कंडोम का पैकेट बोला - " जब तुम्हारी व्यवस्था करने में ही पुरुष दिन-रात एक करेगा, तो दाम्पत्य कर्तव्य वह कैसे निभायेगा , और निभायेगा भी तो उतावलेपन में मेरा इस्तेमाल करेगा कौन,भले उत्पत्ति होती रहे, कष्ट पुरुष को नहीं, स्त्री को ही तो होना है !"

"हम तो उत्पत्ति ही करते हैं, कष्ट किसी को भी हो, शतरंज की सतरंगी बिसातों में मनुष्य तरह तरह की चालें चलकर हमारी व्यवस्था करता है " - काले धन ने इतराते हुये कहा - " गुप्त जगहों पर पड़े हुए हमारे नोट पुराने हो जायें, सड़-गल भी जायें, तो क्या हुआ ? तब भी हमारे दिन फिरते हैं , हमसे फिर नई उत्पत्ति होती रहती है।"

"हाँ, सच कह रहे हो, हमारी कम्पनियां कई तरह की चालें चलकर कभी डिजाइन, कभी रंग बदलकर, तो कभी सुगंध भर कर तरह तरह के विज्ञापनों से ग्राहकों को लुभाती हैं , लेकिन सब व्यर्थ "- कंडोम के पैकेट ने गलती हुई रबर की तरह बदबू फैलाते हुये कहा - " तुम्हारा बढ़िया है, काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर जितनी बातें और राजनीति होती है उतनी ही ज़्यादा तुम्हारी उत्पत्ति होती जाती है, उतने ही तुम्हारे रंग-रूप बदलते हैं । तुम्हारी व्याख्या भी तो यही है न, 'काले धन की सत्ता, काले धन द्वारा, काले धन के लिए !' काले धन और भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों और क़ानूनों को तुम हमेशा मात देते आये हो ।और तुम्हारा उपयोग भी तो हर हाल में देश-विदेश में हो ही जाता है !"

"उपयोग तो तुम्हारा भी होता है हर जगह, हर वर्ग में तरह तरह की चालों से मेरी तरह सिर्फ "अय्याशी" में ! हाँ, फर्क यहाँ पर है कि हम सबको शह और मात देते रहते हैं, किन्तु तुम जनसंख्या विस्फोट को कभी मात नहीं दे पाये ! दूसरा यह कि तुम यौन रोगों की उत्पत्ति को रोक लेते हो और हम ग़रीबों और देश की तरक़्क़ी को !"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 3:47am
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देने हेतु सभी पाठकों को तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया।

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