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"पैंतीस का उत्सव" - (लघुकथा) 23 - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"अंकल जी, बर्थडे का सामान दे दो , ये छोटा वाला केक कितने में मिलेगा ?" - सोनू ने बेकरी वाले से पूछा।
"डेढ़ सौ रुपये का"
जवाब सुनकर सोनू आँखें फाड़े साथियों की तरफ देखने लगा । सभी ने अपनी जेबों से पैसे निकाले। कुछ सिक्के, कुछ पुराने फटे से नोट, कुल जमा पैंतीस रुपये थे। छोटे भाई का बर्थडे तो मनाना ही है।

"लो अंकल जी, पैंतीस रुपये में छोटा सा कोई केक और बाक़ी सामान पैक कर दो !" - सोनू ने निराश हो कर कहा। बेकरी वाले को हँसी आ गई । फटे पुराने से कपड़े पहने हुए बच्चों को देखकर काउंटर के पास खड़े वर्मा जी का मन अपना वाला केक उन बच्चों को देने को हुआ, लेकिन क्या कर सकते थे, पत्नी की पसंद का बुक किया हुआ केक था ।

इस बीच सोनू ने साथियों से कहा- "देखो , केक रहने देते हैं, टोफियां या समोसे ले लेते हैं। बगल वाले डी.जे. वाले अंकल से कह देंगे कि दुकान से ही तेज़ गाने बजा दें, अपन गोलू के घर में जम के डांस करेंगे, ठीक है न !"

"सोनू, हमने तो पहले ही कहा था कि रहने दे पार्टी-वार्टी, अपन 'रईसों वाला' नहीं, 'अपना वाला' जश्न मनायेंगे , हनुमान मंदिर में प्रसाद चढ़ाके, गायेंगे चालीसा और भजन !" - गोलू ने सोनू का हाथ खींचकर कहा ।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 3:46am
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय प्रतिभा पाण्डेय जी व सभी पाठकगण।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 3:42am
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय प्रतिभा पाण्डेय जी व सभी पाठकगण।
Comment by pratibha pande on November 2, 2015 at 7:09pm

बच्चों का छोटा सा संसार और  ,जब छोटी छोटी इच्छाओं को बड़ी समझदारी ओढ़नी पड़ती है  तब सारे नारे और वादे खोखले लगते हैं , कोमल भावनाओं को बहुत सार्थक शब्द दिए हैं आपने इस कथा के माध्यम से ,हार्दिक बधाई आपको आदरणीय उस्मानी जी,कथा का शीर्षक भी गज़ब का है  

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 1, 2015 at 10:15pm
मेरी इस रचना पर उपस्थित हो कर प्रोत्साहित करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी व आदरणीया नीता कसार जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 1, 2015 at 9:58pm

बहुत बढ़िया प्रस्तुति हुई है आदरणीय उस्मानी जी बधाई 

Comment by Nita Kasar on November 1, 2015 at 1:33pm
तंगहाली भी बच्चों को समझौता करना सिखादेती है,ये बच्चे बाल पन से ही कितने समझदार हो जाते है संवेदनशील कथा के लिये बधाई आद०शेखशाहुद उस्मानी जी ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 31, 2015 at 1:04pm
हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय Dr. Ashutosh Mishra जी व आदरणीय Digvijay जी, मेरी रचना पर उपस्थित हो कर प्रोत्साहित करने के लिए।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 31, 2015 at 12:26pm

आदरणीय उस्मानी जी ..वाकई अभावों में भी किस तरह हम जी लेते हैं ..दिल को छू लेने वाली इस शानदार लघुकथा के लिए ह्रदय से बधाई सादर 

Comment by DIGVIJAY on October 30, 2015 at 3:59pm

बहुत ही उम्दा रचना....हार्दिक बधाई आपको । सादर

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