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मार्गदर्शिका (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी (44)

"हाँ दीदी , आपने जैसा समझाया था, वैसा ही कर रही हूँ। देवरानी, जिठानी और यहाँ तक कि मेरे पति देव जी को भी पता नहीं चल पाता कि मैं सास- ससुर की कब सेवा कर उनकी पसंद की चीज़ें कब उन्हें खिला देती हूँ । पूरी पकड़ हो गई है मेरी उन पर !" - छत पर बैठे हुए उमा ने कहा।

"बढ़िया है । देवरानी और जिठानी को उनकी नज़रों में चढ़ने मत देना । सास-ससुर को यही लगना चाहिए कि तुम ही सबसे अच्छी बहू हो । कोम्पीटीशन का ज़माना है !"

"जी दीदी, अब तो आलम ये है कि सास-ससुर मेरे पति तक की नहीं सुनते, मेरी ही हर बात मानते हैं। अब मैं जो कराना चाहूं करा सकती हूं उनसे !"

"ये हुई न बात ! पेन्शन, जेवरों और प्रोपर्टी का बेस्ट हिस्सा तुझे मिलना चाहिए बस !"

कुछ दिनों से घर के माहौल पर चुपके से कड़ी नज़र रख रहे सुदीप ने संयोग से पूरा वार्तालाप सुन लिया । पत्नी को नीचे बुलाकर उसने कहा -

"तो इसलिए आते हैं यहाँ तुम्हारे मायके वाले ?

"जैसे माँ-बाप, वैसा ही बेटा, छिप कर बातें सुन रहे थे !"

"जी नहीं ! मार्गदर्शन ले रहा था मुखौटों से !"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 6:14am
रचना पटल पर समय देने हेतु सभी पाठकगण को तहे दिल से बहुत बहुत धन्यवाद।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 12, 2016 at 10:51am
स्नेहिल प्रोत्साहक समीक्षात्मक टिप्पणी करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया कान्ता राय जी।
Comment by kanta roy on December 22, 2015 at 1:25pm

आपका  यहां इस प्रस्तुति में  कुछ समेटकर लिखने में नया सा प्रयास हुआ है , तकनीकों के प्रति आपका  सचेतन होना तारीफ़ के काबिल है।  बधाई कबूल कीजिये आदरणीया शहज़ाद जी। 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 21, 2015 at 6:31pm
जी बिलकुल सही कहा है आपने। पूरी कोशिश करूँगा कि आप सभी की अपेक्षा अनुरूप कुछ नवीन रचनात्मक लेखन कर्म कर सकूँ । प्रोत्साहित करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2015 at 10:45pm

लघुकथा का तथ्य-कथ्य तो पुराना है, या कहिये, दसियों-बीसियों बार प्रयुक्त हो चुका है. लेकिन आपका प्रयास करना भला लगा है. विश्वास है, आने वाले दिनों में आपके कथ्य तथा उनके बिम्बों में नयापन भी दिखेगा. यहाँ नयापन से आशय इन्नोवेशन या क्रियेटिविटी से है. 

शुभेच्छाएँ. 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 20, 2015 at 6:53pm
ब्लोग पोस्ट पर उपस्थित हो कर प्रोत्साहित करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया जानकी बिष्ट वाही जी।
Comment by Janki wahie on December 20, 2015 at 6:32am
इन चेहर्रो की भी क्या कहेँ ।एक ज़बरदस्त कथा । मानव मन की बखिया। उधेड़ती । बधाई शहज़ाद जी।

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