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चार शेर ( फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन  )

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

(बह्र: रमल मुसम्मन महजूफ)

2122. 2122. 212.

ज़िन्दगी भर ये परेशानी रही

मेरे चारो सम्त वीरानी रही ।।

जिस के पीछे अब ज़माना है पढ़ा

वो कभी मेरी भी दीवानी रही ।।

शब मिलन की थी बहुत गहरी मगर

रात भर तारो की निगरानी रही।।

दोस्ती कर ली किताबों से मैं ने

भूलने में उसको आसानी रही ।।

- शेख़ ज़ुबैर अहमद

( मौलिक एवम अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by Shaikh Zubair on March 17, 2020 at 9:09pm
उस्ताद ए मोहतरम समर कबीर साहब आपने बेहद कीमती इस्लाह दी,बेहद शुक्रिया, ख़ुदा आपको सलामत रखे।
मैं दोनो शेर सही कर लेता हूँ।
बोहत शुक्रिया।
Comment by Samar kabeer on March 17, 2020 at 7:07am

जनाब शैख़ ज़ुबैर जी आदाब,अच्छे अशआर हुए हैं,बधाई स्वीकार करें ।

जिस के पीछे अब ज़माना है पढ़ा

वो कभी मेरी भी दीवानी रही'

इस शैर को यूँ कर लें:-

'जिसके पीछे ये ज़माना है पड़ा

वो हमेशा मेरी दीवानी रही'

'दोस्ती कर ली किताबों से मैं ने'

इस मिसरे को यूँ कर लें:-

'दोस्ती जब से किताबों से हुई'

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