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क्यों चलते औरों के पथ पर स्वयं बनाओ अपनी राहें |(७४ )

एक ताज़ा गीत

=========

क्यों चलते औरों के पथ पर

स्वयं बनाओ अपनी राहें |

**

माँ की उँगली थाम बहुत तुम

सीख गए पाँवोँ पर चलना |

लेकिन अब काँटों के पथ पर

खुद ही गिरना और सँभलना |

जीवन-रण से बचना मुश्किल

लड़कर करनी जीत सुनिश्चित,

भाग नहीं सकता है कोई

मित्र भागना खुद को छलना |

तुम अपने जीवन के नायक

कोई काम करो अब ऐसा,

जिससे तुम पर दुनिया भर के

सब लोगों की टिके निगाहें |

**

क्यों चलते औरों के पथ पर

स्वयं बनाओ अपनी राहें |

**

अपनी राहों पर चलने में

कुछ भटकावों का भी सहरा |

और साथ में थोड़ा रहता

राह भटकने का भी ख़तरा |

इसी लिए यह बहुत ज़रूरी

राह सुनिश्चित करें समझ कर,

सदा आचरण रखना निर्मल

और जीभ पर रहे शर्करा |

वर्ना ऐसा भी संभव है

चालें सब पड़ जाएँ उल्टी,

और ज़िंदगी भर की खातिर

मित्र गले पड़ जाएँ आहें |

**

क्यों चलते औरों के पथ पर

स्वयं बनाओ अपनी राहें |

**

भला लकीरों पर चलने से

नूतन पथ किसने पाया है?

सच में उसने केवल अपना

जग में वक़्त किया ज़ाया है |

अब तक की तारीख़ बताती

उसने ही इतिहास बनाया,

काम लीक से हटकर करना

जब जब भी जिसको भाया है |

याद रहे उगते सूरज को

लोग सदा पूजा करते हैं,

और सफल लोगों से मिलता

नित्य जगत फैलाकर बाहें |

**

क्यों चलते औरों के पथ पर

स्वयं बनाओ अपनी राहें |

**

गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 25, 2020 at 10:53am

सादर आभार आदरणीय Samar kabeer साहेब इस उत्साहवर्धन के लिए 

Comment by Samar kabeer on March 24, 2020 at 7:27pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, अच्छा गीत लिखा आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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