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उनके लाल कपोल नहीं होते- ग़ज़ल

जीवन के रिश्तों में इतने झोल नहीं होते 

अपने मुँह में जो ये कड़वे बोल नहीं होते 

 

रस्ता एक पकड़ कर यदि चलते ही जाते हम

मंजिल तक अपने पग डाँवाडोल नहीं होते 

 

कृष्ण भक्ति में अगर नहीं डूबी होती मीरा  

उसके प्याले में भी विष के घोल नहीं होते 

 

गाँव शहर में कुछ तो फर्क रहा होगा, वरना 

आज वहाँ पर बिन तारों के पोल नहीं होते 

 

प्यार को अपने नजर नहीं लगती इस दुनिया की  

रोजाना यदि हमने पीटे ढोल नहीं होते 

 

कुछ तो खोना ही पड़ता है प्यार मुहब्बत में  

त्याग बिना तो ये रिश्ते अनमोल नहीं होते 

 

मोबाइल पर किसने छेड़ा उनको हाय 'बसन्त'  

वरना यूँ ही उनके लाल कपोल नहीं होते

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 27, 2020 at 6:56pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सादर नमस्कार , आपकी हौसलाअफजाई ही मेरा संबल है, सादर नमन आपको 

Comment by नाथ सोनांचली on April 23, 2020 at 1:55pm

आद0 बसन्त कुमार शर्मा जी सादर अभिवादन। बढ़िया हिंदी शब्दों का प्रयोग करते हुए आम बोल चाल में ग़ज़ल कही आपने। बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 20, 2020 at 8:40am

आदरणीय  Dayaram Methani जी सादर नमस्कार, आपकी हौसलाअफजाई हेतु दिल से शुक्रिया 

Comment by Dayaram Methani on April 19, 2020 at 8:38pm

सुंदर गज़ल आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी। बधाई स्वीकार करें।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2020 at 11:26am

आदरणीय TEJ VEER SINGH जी सादर नमस्कार , आपकी हौसलाअफजाई हेतु दिल से शुक्रिया 

Comment by TEJ VEER SINGH on April 19, 2020 at 9:46am

हार्दिक बधाई आदरणीय बसन्त कुमार शर्मा जी। बेहतरीन गज़ल।

कुछ तो खोना ही पड़ता है प्यार मुहब्बत में  

त्याग बिना तो ये रिश्ते अनमोल नहीं होते 

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