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2122 2122 2122 2122

इश्क बनता जा रहा व्यापार पानी गिर रहा है 
हुस्न रस्ते में खड़ा लाचार पानी गिर रहा है

चंद जुगनू पूँछ पर बत्ती लगाकर सूर्य को ही
बेहयाई से रहे ललकार पानी गिर रहा है 

टाँगकर झोला फ़कीरी का लबादा ओढ़कर अब
हो रहा खैरात का व्यापार पानी गिर रहा है 

बाप दादों की कमाई को सरे नीलाम कर वह
खुद को साबित कर रहा हुँशियार पानी गिर रहा है 

झूठ के लश्कर बुलंदी की तरफ बढ़ने लगे हैं
साँच की होने लगी है हार पानी गिर रहा है 

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by आशीष यादव 3 hours ago

आदरणीय श्री लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by आशीष यादव 3 hours ago

आदरणीय श्री अमीरुद्दीन 'अमीर' जी 

हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद। गलतियों से अवगत कराने के लिए नमन। उम्मीद करूँगा कि आगे भी मार्गदर्शन करते रहें।

Comment by आशीष यादव 3 hours ago

आदरणीया Dimple Sharma जी बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' yesterday

आ. भाई आशीष यादव जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on Thursday

जनाब आशीष यादव जी आदाब, उम्दा ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

जनाब उर्दू अल्फा़ज़: इश्क़, ख़ैरात और ख़ुद पर नुक़्ते छूट गये हैं साथ ही 'हुँशियार' से चन्द्र बिन्दु हटा लीजियेगा। सादर। 

Comment by Dimple Sharma on Thursday

आदरणीय आशीष यादव जी नमस्ते, बहुत ख़ूब वाह रदिफ़ कमाल ली है आदरणीय आपने खुबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

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