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गजल(रात क्या क्या गुनगुनाती...)

2122  2122  212

रात क्या क्या गुनगुनाती रह गई
आपकी बस याद आती रह गई।1

सर्द मौसम हो गया कातिल बहुत
सांस अपनी सनसनाती रह गई।2

चांद में है दाग़,देखा आपने,
चांदनी यूं मुस्कुराती रह गई।3

सिलसिले सब याद में आते रहे
आरज़ू तो कुनमुनाती रह गई।4

गीत बनता लय पिरोकर,क्या कहूं?
बात दिल की ही लजाती रह गई।5

आंख हरदम जो बिछाती थी हवा,
इस दफा वह भाव खाती रह गई। 6

आशिया रौशन हुआ था बस अभी
इक घड़ी दियरे बुझाती रह गई?7
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on September 2, 2020 at 4:30pm

तहे दिल से शुक्रिया आदरणीया डिंपल जी।

Comment by Dimple Sharma on September 2, 2020 at 4:17pm

आदरणीय मनन कुमार सिंह जी नमस्ते खुबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

Comment by Manan Kumar singh on August 29, 2020 at 4:43pm

आदरणीय समर जी!आपका आभार।

"सिलसिला है इक गजल भी 

और चलती जा रही है।..."

Comment by Manan Kumar singh on August 29, 2020 at 4:38pm

आभार आशीष जी।

Comment by आशीष यादव on August 25, 2020 at 11:45pm

अच्छी गजल हुई है। बधाई स्वीकार कीजिए।

Comment by Samar kabeer on August 25, 2020 at 3:20pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

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