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सितारे लौंग से कमतर नयन मृग से भी अच्छे हैं -गजल

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२


अकेलेपन को भी हमने किया चौपाल के जैसा
बचा लेगा दुखों में  ये  हमें  फिर ढाल के जैसा।१।
**
भले ही दुश्मनी कितनी मगर आशीष हम देते
कभी दुश्मन न देखे बीसवें इस साल के जैसा।२।
**
इसी से है जगतभर में हरापन जो भी दिखता है
हमारे मन का सागर  ये  न  सूखे ताल के जैसा।३।
**
सितारे अपने भी जगमग न कमतर चाँद से होते
अगर ये भाग्य भी  होता  चमकते भाल के जैसा।४।
**
सितारे लौंग से कमतर नयन मृग से भी अच्छे हैं
हमें तो  चाँद  भी  लगता  तुम्हारे  गाल  के जैसा।५।
**
हुए जाते दिनोंदिन हम किसी कातर हिरन से यूँ
समय होने लगा है  व्याध  डाले  जाल के जैसा।६।

मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2020 at 5:24am

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर अपकी उपस्थिति से लेखन सफल हुआ । मार्गदर्शन के लिए आभार । 

"के जैसा" के स्थान पर "जैसा ही" करना क्या उचित रहेगा , मार्गदर्शन करें । सादर आभार..

Comment by Samar kabeer on September 12, 2020 at 3:26pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार  करें ।

रदीफ़ "के जैसा" में 'के' शब्द भर्ती का है ग़ौर करें ।

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