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कब धरती का दुख समझे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

जिनके धन्धे  दोहन  वाले  कब  धरती का दुख समझे
सुन्दर तन औ' मन के काले कब धरती का दुख समझे।१।
**
जिसने समझा थाती धरा को वो घावों को भरता नित
केवल शोर  मचाने  वाले  कब  धरती का दुख समझे।२।
**
ताल, तलैया, झरने, नदिया इस के दुख में सूखे नित
और नदी सा बनते नाले  कब धरती का दुख समझे।३।
**
पेड़ कटे तो बादल  रूठा  और  हवाएँ  सब झपटीं
ये सड़कों के बढ़ते जाले कब धरती का दुख समझे।४।
**
नित्य सितारों से गलबहियाँ उनकी तो हो जाती हैं
चाँद नगर में रहने वाले कब धरती का दुख समझे।५।


मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Sunday

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर आपकी उपस्थिति से लेखन सफल हुआ । स्नेह के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by Samar kabeer on Sunday

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2020 at 5:48am

आ. भाई हर्ष महाजन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2020 at 5:47am

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार ।

Comment by Harash Mahajan on September 12, 2020 at 6:19pm

आदरणीय धामी जी बहुत उम्दा ग़ज़ल । मेरी जानिब से ढ़ेरों दाद वसूल पाइएगा ।

सादर ।

Comment by सालिक गणवीर on September 12, 2020 at 5:54pm

भाई लक्ष्मण धामी जी

सादर अभिवादन

बढ़िया ग़ज़ल के लिए ढेर सारी दाद और मुबारकबाद क़ुबूल करें. सादर व सप्रेम.

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