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1222 - 1222 - 1222 - 1222

न यूँ दर-दर भटकते हम जो अपना आशियाँ होता

ख़ुदा ने काश हमको भी किया अह्ल-ए-मकाँ होता 

बिछा  के राहों  में काँटे  पता देते  हैं  मंज़िल   का

कोई  तो  रहनुमा   होता  कोई   तो  मेह्रबाँ   होता

ख़ुदा या  फेर लेता रुख़  जो तू भी ग़म के मारों से

तो  मुझ-से  बेक़रारों का ठिकाना फिर कहाँ होता

बने  तुम  हमसफ़र  मेरे  ख़ुदा  का   शुक्र  है वर्ना 

न  जाने  तुम  कहाँ  होते  न  जाने मैं  कहाँ  होता

हमारे  ग़म-ज़दा  चहरों  की न  पढ़ते  इबारत  तुम 

तो अपना दर्द-ए-ग़म हमसे न लफ़्ज़ों में बयाँ होता 

चलो  ये  राज़  टूटे दिल से ज़ाहिर  हो  गया  वर्ना 

दराज़-ए-दिल में पोशीदा  न ये ग़म भी अयाँ होता 

वतन पे आह! मिटने की  रही ख़्वाहिश अधूरी ही 

मुक़द्दर में  ये होता गर  तो अपना भी  निशाँ होता 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 20, 2020 at 8:02pm

जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से मशकूर हूँ ।

शाद-ओ-आबाद रहें। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 5, 2020 at 8:36am

आदरणीय चेतन प्रकाश जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद, ऐजाज़ बख़्शने और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से शुक्रिया। सादर।

Comment by Chetan Prakash on October 5, 2020 at 8:29am

बह्रे हज़ज मुसम्मन सालिम में कही गयी साफ-सुथरी बढ़िया ग़ज़ल, वाह क्या कहने, बधाई शायर 'अमीर' साहब को !

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