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उसको भाया भीड़ का होकर खो जाना -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२


हाथ पकड़ कर चाहा जिसका हो जाना
उसको भाया भीड़ का होकर खो जाना।१।
**
किस्मत किस्मत रटते सबको देखा पर
एक न पाया जिस ने किस्मत को जाना।२।
**
मीत  अकेलेपन  सा  कोई  और  नहीं
लेकिन ये भी सब  को पाया तो जाना।३।
**
नींद  न  आये  तो  ये  कैसे  भूलें  हम
झील किनारे गोद में सर रख सो जाना।४।
**
पीर हमें अब लगती सच में अपनी सी
फूल के  बदले  पथ में  काँटे  बो जाना।५।
**
बाद  तुम्हारे  तम  में  बैठे  अलसाये
कौन जलाये साँझ में दीपक रोजाना।६।
**
                            (५.१०.२०२०)

मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2020 at 9:22am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार। 

Comment by TEJ VEER SINGH on October 27, 2020 at 8:46am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी ।लाज़वाब गज़ल।

पीर हमें अब लगती सच में अपनी सी
फूल के  बदले  पथ में  काँटे  बो जाना।५।
**

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 24, 2020 at 9:49am

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 23, 2020 at 5:15pm

आदरणीय लक्षण धामी जी सादर नमस्कार 
उम्दा ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाइयाँ स्वीकार करें. सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 20, 2020 at 1:07pm

आ. भाई रूपम जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व मनभावन प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 20, 2020 at 1:05pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 20, 2020 at 1:05pm

आ. भाई अमीरुद्ददीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 20, 2020 at 1:03pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए आभार ।

अंंतिम शेर को आपके परामर्शानुसार गजल से हटाना ही उचित होगा। सादर...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 20, 2020 at 1:02pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए आभार ।

अंंतिम शेर को आपके परामर्शानुसार गजल से हटाना ही उचित होगा। सादर...

Comment by Rupam kumar -'मीत' on October 20, 2020 at 8:21am

आ. लक्ष्मण जी,

ग़ज़ल के प्रयास के लिए बधाई, बह्र-ए-मीर पर ख़ूब शे'र कहे आपने वाह!!

कृपया ध्यान दे...

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