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गजल : गजल-गीत संवेदना के हैं जाये // सौरभ

122   122   122   122 

  
रजाई में दुबके, कहे सुन छमाछम..
किचन तक गयी धूप जाड़े की पुरनम
 
चकित चौंक उठतीं नवोढ़ा की आँखें
मुई चूड़ियो मत उठा शोर मद्धम
 
तुम्हीं को मुबारक जो ठानी है कुट्टी
नजर तो नजर से उठाती है सरगम
 
गजल-गीत संवेदना के हैं जाये
रखें हौसला पर जमाने का कायम
 
भरी जेब, निश्चिंतता हो मुखर तो
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम
 
निराला जो ताना, तो बाना गजब का
नए नाम-यश का उड़ाना है परचम
 
रिसालों में तिकड़म से फोटू छपा कर
बजा गाल ’सौरभ’ कहे.. ’बस हमीं हम’
***
मौलिक और अप्रकाशित 

 

नवोढ़ा - नई दुल्हन 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 12, 2022 at 4:04pm

भाई मनोज अहसास जी, 

//आपने इस ग़ज़ल में नुक्तों पर ध्यान नहीं दिया या किसी कारण से नुक्ते छोड़ दिये //

मैं हिंदी भाषा में देवनागरी लिपि के माध्यम से रचनाकर्म करता हूँ, जहाँ नुख्तों की न तो बाध्यता है, न ही आवश्यकता.

अतः यह बिन्दु रचनाकर्म के क्रम में मेरे लिए गौण है. भावबोध के संप्रेषण के लिए प्रयुक्त माध्यम में उसकी सीमाओं के पार जाकर किसी बाध्यता को मैं अनावश्यक ही मानता हूँ.

अब कोई पाठक शाब्दिक हुए भावबोध को उसमें  मात्र नुख्ता के न होने के कारण उसे खारिज करता है, तो उसकी पाठकीयता और ततस्थता पर संदेह होना लाजिमी है. 

//... मुई चूड़ियों मत उठा शोर मद्धम ... ये वाक्य क्या व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध नहीं हो गया है//

आप उस बिन्दु का संदर्भ तो दें जिसके कारण यह पंक्ति व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध हो या प्रतीत हो रहा हो. 

सर्वोपरि, प्रयुक्त शब्द चुड़ियो है न कि चुड़ियों, जैसा कि आपने लिखा है. ऐसा इसलिए कि चुड़ियों को सम्बोधित किया जा रहा है. 

//इस ग़ज़ल की हार्दिक बधाई //

हार्दिक धन्यवाद. 

वस्तुतः चर्चा प्रस्तुति पर होनी चाहिए न कि बनावटी बाध्यताओं पर. 

 

शुभातिशुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 12, 2022 at 3:52pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, अनुमोदन हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद. 

Comment by मनोज अहसास on January 12, 2022 at 12:30am

आदरणीय सर सादर नमस्कार

एक नवीन प्रयोग सी इस ग़ज़ल की हार्दिक बधाई

दो बातें सादर निवेदित है 

पहली ऐसा लगता है आपने इस ग़ज़ल में नुक्तों पर ध्यान नहीं दिया या किसी कारण से नुक्ते छोड़ दिये 

दूसरी मुई चूड़ियों मत उठा शोर मद्धम

ये वाक्य क्या व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध नहीं हो गया है

मार्गदर्शन सादर निवेदित है

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 5, 2022 at 2:29pm

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन गजल हुई है। हार्दिक बधाई.

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