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ग़ज़ल-अपना है कहाँ

2122 2122 2122 212

1

औरों के जैसा मुकद्दर यार अपना है कहाँ

अपने दिल का जोर उसके दिल प चलता है कहाँ

2

रात होती है कहाँ और दिन गुज़रता है कहाँ

मन मुआफ़िक़़ ज़िन्दगी में जीना मरना है कहाँ

3

एक दिन में कुछ नहीं पर एक दिन होगा ज़रूर

आदमी ये सब्र तब तक यार रखता है कहाँ'

4

आज तक कोई नहीं यह जान पाया दोस्तो

इस ज़माने को बनाने वाला रहता है कहाँ

 5

किस तरह भर लूँ उनींदी आँखों में ख़्वाबों के रंग

थपकियाँ देकर सुलाने चाँद आया है कहाँ

6

रूह को"निर्मल" मयस्सर क़ुर्ब हो भी किस तरह 

वो नज़र अपनी वहाँ तक ले के जाता है कहाँ

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by gumnaam pithoragarhi on May 21, 2022 at 8:30am

वाह बहुत खूब गजल हुई है है .। बहुत खूब .. 

Comment by gumnaam pithoragarhi on May 21, 2022 at 8:28am

वाह बहुत खूब गजल हुई है है .। बहुत खूब .. 

Comment by Rachna Bhatia on May 14, 2022 at 3:55am

आदरणीय समर कबीर सर् सादर नमस्कार।सर् आपके कहे अनुसार सुधार कर दिए हैं।

ग़ज़ल सहीह करने के लिए बेहद शुक्रिय:।

Comment by Samar kabeer on May 12, 2022 at 6:09pm

''अपने दिल का जोर उसके दिल प चलता है कहाँ"

अब मिसरा ठीक है ।

Comment by Rachna Bhatia on May 12, 2022 at 5:45pm

आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी ग़ज़ल तक आने तथा अपनी राय रखने के लिए हार्दिक धन्यवाद।

आपने सही कहा लेकिन मुझे लगता है कि ख़्वाब नींद आने पर ही आते हैं और ख़्वाब ज़रूरी नहीं कि मनपसंद आएँ। 

फिर भी आदरणीय समर कबीर सर् से बात कर लेती हूँ। 

सादर।

Comment by Rachna Bhatia on May 12, 2022 at 5:40pm

आदरणीय समर कबीर सर् सादर नमस्कार। उत्तर देरी से देने के लिए क्षमा चाहती हूँ।

आदरणीय सर्, आपने सही कहा कि मिसरअ बह्र में नहीं है।

क्या पर को प कर दूँ।

"अपने दिल का जोर उसके दिल प चलता है कहाँ"

बाक़ी सही कर देती हूँ।

सर् आपका ग़ज़ल तक आने तथा इस्लाह देने के लिए बेहद शुक्रिय:।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 10, 2022 at 6:34pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही है आपने मुबारकबाद पेश करता हूँ, मुहतरम समर कबीर साहिब ने बहतरीन इस्लाह फ़रमाई है, 

"किस तरह भर लूँ उनींदी आँखों में ख़्वाबों के रंग" इस मिसरे के शिल्प पर ग़ौर कीजियेगा, 'उनींदी आँखें' मतलब नींद से भरी हुई आँखें यानि ख़्वाब आ सकते हैं :-)) मुनासिब समझें तो इस मिसरे को यूँ कर लें -

"जागती आँखों में भर लूँ किस तरह ख़्वाबों के रंग" 

Comment by Samar kabeer on May 10, 2022 at 3:17pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी अआदाब , ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें I 

'अपने दिल का जोर उसके दिल पर चलता है कहाँ'--ये मिसरा बह्र में नहीं देखें I 

'मन मुआफ़िक ज़िन्दगी में जीना मरना है कहाँ'--मुआफ़िक--"मुआफ़िक़"

'आदमी पर सब्र तब तक यार रखता है कहाँ'--इस मिसरे को यूँ कहें :-

'आदमी ये  सब्र तब तक यार रखता है कहाँ'

'रूह को"निर्मल" मयस्सर कुर्ब हो भी किस तरह'--कुर्ब --"क़ुर्ब" 

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