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ग़ज़ल (फ़ेलुन बह्र)

(आ. समर सर जी की इस्लाह के बाद)

(22 22 22 22)

सोचा कुछ तो होगा उसने

हमको मुड़कर देखा उसने

कौन वफ़ा करता है ऐसी

सारी उम्र सताया उसने 

जुड़ता कैसे ये टूटा दिल

टुकड़े करके छोड़ा उसने 

जब-जब ज़िक्र-ए-उल्फ़त छेड़ा

तब-तब मुझको टोका उसने 

उसको कौन समझ सकता था

बदला रोज़ मुखौटा उसने 

जिसको सबसे बढ़कर चाहा

छोड़ा मुझको तन्हा उसने 

जाकर वापस क्यों आता मैं

बाद-ए-मर्ग पुकारा उसने 

'ज़ैफ़' ग़ज़ल कहता है सच्ची

अच्छा नाम कमाया उसने 

(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Zaif on November 24, 2022 at 4:15am

बहुत शुक्रिया, आ. समर सर। सादर

Comment by Samar kabeer on November 23, 2022 at 11:45am

अब ग़ज़ल ख़ूब हो गई, पुनः बधाई ।

Comment by Zaif on November 18, 2022 at 7:02pm

बहुत शुक्रिया आपका, आदरणीय समर सर, सादर।

Comment by Samar kabeer on November 18, 2022 at 2:14pm

जनाब ज़ैफ़ जी आदाब, ग़ज़ल  का प्रयास अच्छा है , बधाई स्वीकार करें I 

'लाख जुड़ाना चाहा उसने'--- इस मिसरे में 'जुड़ाना' शब्द उचित नहीं है, बदलने का प्रयास करें I  

'जिसको सबसे ज़्यादा चाहा'--- इस मिसरे में आपकी जानकारी के लिए बता रहा हूँ कि सहीह शब्द "ज़ियादा" १२२ है, ग़ज़ल में इसे 22 पर लेना  उचित नहीं, देखिएगा I 

Comment by Zaif on November 16, 2022 at 1:21am

बहुत शुक्रिया आदरणीय, डॉ. छोटेलाल जी।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on November 15, 2022 at 7:34pm

आदरणीय जैफ जी बहुत ही भावपरक एक बेहतरीन गजल पढ़कर हृतकंज सरसित हुआ दिली मुबारकवाद क़ुबूल कीजिए

कृपया ध्यान दे...

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