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 वसन्त

उषा अवस्थी

पतझड़ हुआ विराग का

खिले मिलन के फूल

 

प्रेम, त्याग, आनन्द की

चली पवन अनुकूल

चिन्ता, भय,और शोक का 

मिटा शीत अवसाद

शान्ति, धैर्य, सन्तोष संग 

प्रकटा प्रेम प्रसाद

सरस नेह सरसों खिली 

अन्तर भरे उमंग

पीत वसन की ओढ़नी, 

थिर सब हुईं तरंग

शिव शक्ती का यह मिलन,

अद्भुत, अगम, अनन्त

गति मति अविचल,अपरिमित, 

अव्याख्येय वसन्त

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2023 at 4:00pm

आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Usha Awasthi on January 27, 2023 at 3:56pm

हार्दिक धन्यवाद आपका, फूलसिंह जी, सादर।

Comment by PHOOL SINGH on January 27, 2023 at 2:55pm

महोदया बहुत ही अच्छी रचना साधुवाद 

Comment by Usha Awasthi on January 27, 2023 at 12:59pm

हार्दिक आभार आपका मनोज अहसास जी, सादर

Comment by मनोज अहसास on January 26, 2023 at 9:07pm

बसंत पर आधारित बहुत सुंदर रचना हुई आदरणीय बहुत-बहुत बधाई

कृपया ध्यान दे...

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