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आसमान छूने की चाहत में

कितने दूर हो जाते हैं 

हम ज़मीन से.

 

रिश्तों की दीवारें

ढह जाती हैं

स्वार्थों की चोट से,

चढ़ जाती है 

स्नेह पर

गुरुत्व की परत,

चलते हैं

गडा कर नज़रें

आसमां पर

और कुचलते 

स्वप्न और अरमान 

अपनों के,

पैरों तले.

 

लेकिन पाते हैं एक दिन 

अपने आप को अकेला

दूर क्षितिज पर,

तरसते 

एक कोमल नन्हे हाथ को

जो पोंछ दे आंसू

अकेलेपन के.


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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 4, 2011 at 5:45pm

कैलाश जी , इस रचना के मर्म को महसूस करना सबके बस की बात नहीं, ऐसे भाव भी अकस्मात् नहीं आते, बहुत ही सशक्त रचना बन पड़ी है, बहुत बहुत बधाई आपको |

Comment by Kailash C Sharma on September 3, 2011 at 3:13pm

बहुत बहुत शुक्रिया मोनिका जी, सौरभ जी और आशीष जी ...

Comment by आशीष यादव on September 3, 2011 at 1:37pm

आधुनिक जीवन की की यही सच्चाई हो गई है|
इस सच्चाई को आपने बखूबी लिखा है|
लेखनी को नमन है|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 2, 2011 at 3:03am

जिस ढंग, परिपाटी और साधन को आजका मानव सफलता-प्राप्त करने का पर्याय समझ बैठा है उस सफलता की प्राप्ति उस मानव को फिर किस तरह के असहाय एकाकी जीवन जीने को अभिशप्त कर देती है, इस तथ्य को  कवि ने उजागर करने का प्रयास किया है. कवि कैलाशजी को शुभकामनाओं सहित बधाइयाँ. 

Comment by monika on September 2, 2011 at 2:01am

वाह बहुत खूब जीवन के सच को उजागर करती कविता

कृपया ध्यान दे...

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