पहले कभी ऐसा तो था नहीं मैं,
दीवाना तुमने मुझको बना दिया;
सोचा कभी नहीं बदलूँगा मैं,
तेरे इश्क ने मुझको बदल दिया;
इश्क क्या चीज़ है मालूम न था,
तेरे मुहब्बत ने मुझको दीवाना बना दिया;
क्यों करते हो मुझ पर भरोसा इतना,
तेरे विश्वास ने मुझको कमजोर बना दिया;
भूल गया था सब रिश्तो को मैं,
हो गया था बेगाना सभी के लिए,
पर तुने तो मुझको ही अपना बना लिया;
चाहता तो मैं भी हूँ तुझे अपना बनाना,
पर ये कैसी बेबसी है,
जो तुझको भी मुझसे बेगाना बना दिया;
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स्मृत मिश्रा जी, खुबसूरत ख्याल है, प्रयास भी बढ़िया है, उम्मीद करते है और भी कसी हुई रचनाएँ पढ़ने को मिलेगी | आभार इस प्रस्तुति हेतु |
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