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अदब के साथ जो कहता कहन है 
वो अपने आप में एक अंजुमन है

 

हमें धोखे दिये जिसने हमेशा
उसी के प्यार में पागल ये मन है

 

हुई है  दिल्लगी बेशक हमीं से 
कभी रोशन था उजड़ा जो चमन है

 

अँधेरे के लिए शमआ जलाये
जिया की बज्म में गंगोजमन है  

 

नज़र दुश्मन की ठहरेगी कहाँ अब
बँधा सर पे हमेशा जो कफ़न है 

 

खिले हैं फूल मिट्टी है महकती 
यहाँ पर यार जो मेरा दफ़न है 

 

कहाँ परहेज मीठे से हमें अब
वो कहता यार यह तो आदतन है 

 

ये फैशन हाय रे जीने न देगा
कई कपड़ों में भी नंगा बदन है 

 

तुम्हारे हुस्न में फितरत गज़ब की
तभी चितवन में 'अम्बर' बांकपन है 

--अम्बरीष श्रीवास्तव

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Comment by Abhinav Arun on October 2, 2011 at 1:20pm

 

वाह क्या बात है अम्बरीश जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल .. और इस शेर के क्या कहने ..

ये फैशन हाय रे जीने न देगा
कई कपड़ों में भी नंगा बदन है

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 12:07pm

हमें शिकवा नहीं है आपसे जी
हुआ
अच्छा ज़माने का चलन है........हा हा हा हा :-)))))))))))))))


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 2, 2011 at 11:14am

 

अजी क्या आपसे ऐसा, रे बप्पा !

बड़ा ही कातिलाना बांकपन है ...    ;-P    

....  हा हा हा हा ... ..

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 9:37am

तारीफ के लिए शुक्रिया भाई सौरभ जी! 

सादर:

मिटी तस्वीर दिल से यार की जो
हमें गम औ ज़माने को जलन है ......:-)))))))))))))))

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 9:37am

स्वागत है भाई वीनस जी! इस अंदाज़ में ग़ज़ल की तारीफ के लिए तहे दिल से आपका शुक्रिया !...:-)))


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 2, 2011 at 2:14am

आपकी नयी ग़ज़ल, भाई अम्बरीषजी, हिंडोल मचा रही है !  ..  :-)))))

इस शे’र के साथ सादर बधाई --

न आये सामने वो यूँ नज़र फिर

बसे मन में, कला, वर्ना चुभन है. .. 


Comment by वीनस केसरी on October 2, 2011 at 2:01am

वाह वाह वा ...

अम्बरीष जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है

मतला से मकता तक हर एक शेर सुन्दर कहन से भरपूर है

हार्दिक बधाई व तहे दिल से दाद कबूल करें

ये फैशन हाय रे जीने न देगा
कई कपड़ों में भी नंगा बदन है

उफ्फ्फ्फ़

 

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 12:57am

स्वागत है भाई आशीष जी ! इसकी तारीफ के लिए तहे दिल से शुक्रिया! बस यूं की कुछ कहने का मन हुआ तो यह फ़ौरी ग़ज़ल हो गयी ! :-)

Comment by आशीष यादव on October 2, 2011 at 12:38am

वाह अम्बरीश सर,

क्या शानदार ग़ज़ल कही है आपने| कुछ आज की हकीकत तो कुछ तसव्वुर का नजारा| सच में पढ़ कर बेहद मजा आया| 

कृपया ध्यान दे...

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