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प्रगति की गति उसकी धमनी में रक्त बन चले हैं,
सर ढककर ,शोहरत की शौपिंग कर रही है,
लक्की बैम्बू लगा किस्मत सवांर रही है,
किचन में किचन इकोनोमी प्रयोग कर रही है,
कभी हॉट,कभी कूल,कभी प्रीटी लग रही है,
पजामा पार्टी में मनचले गप्पे मरते हुए ,
सामाजिक मुद्दों की परिचर्चा में भाग ले रही है,
मेहनत के टैक्स देकर,सपनों को पूरा कर रही है,
ख्वाहिशों की होम डेलिवेरी घर बैठे ले रही है,
राठौर जैसे मनचलों से लड़ रही है,
कल्पना के आकाश इ एक नाजो-अदा से उड़से रही है.

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Comment by alka tiwari on August 23, 2010 at 12:42pm
आपकी प्रतिक्रिया और सुझाव अपेक्षित है ,निरंतरता बनाए रखे.
धन्यवाद.
Comment by Pankaj Trivedi on August 22, 2010 at 12:56pm
अलका,
इस कविता के लिएँ मेरी हार्दिक शुभकामना स्वीकार करें | एक नारी-कवयित्री होकर ही "नारी के लक्षणों" के सन्दर्भ में कविता लिखे, यह सराहनीय ही है |
वर्त्तमान में जी रही हमारी इन नारीओं को देखो, कितना संघर्ष करती है ! बहुत ही कम शब्दों में अच्छा वर्णन किया है | बधाई |
Comment by आशीष यादव on August 22, 2010 at 9:34am
alka ji pranaam,
aapne aaj ki naari ko behatari se darshaya hai. thanks

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 22, 2010 at 7:24am
बहुत खूब अलका जी, आप की छुवन गजब की है, इतनी कम शब्दों मे आप ने आधुनिक नारी के हर पहलु को छू दिया है, वाह वाह के सिवा और क्या कह सकता हूँ, धन्यवाद,
Comment by alka tiwari on August 22, 2010 at 1:07am
ji koshish ko sarahane ke liye, dhanyvaad.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 21, 2010 at 9:37pm
वाह इन चंद पंक्तियों में आधुनिक भारतीय नारी का सुन्दर वर्णन कर दिया| बहुत सुन्दर

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