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रह कर भी साथ तेरे तुझ से अलग रहे हैं

रह कर भी साथ तेरे तुझ से अलग रहे हैं
कुछ वो समझ रहे थे कुछ हम समझ रहे हैं |


एक वक़्त था गुलों से कतरा के हम भी गुजरे
एक वक़्त है काँटों से हम खुद उलझ रहे हैं |


चाहत की धूप में जो कल सर के बल खड़े थे
मखमल की दूब पर भी अब पांव जल रहे हैं |


उठता हुआ जनाजा देखा वफ़ा का जिस दम
दुश्मन तो रोये लेकिन कुछ दोस्त हंस रहे हैं |


मेरा नाम दीवारों पे लिख लिख के मिटाते हैं
बच्चों की तरह बूढे ये चाल चल रहे हैं |


तूने जिन्हें तराशा मंदिर में जा बसे हैं
पत्थर भी तपिश तेरी किस्मत पे हंस रहे हैं

मेरे काव्य संग्रह ---कनक से ----

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 29, 2010 at 12:10am
बेहतरीन....

तूने जिन्हें तराशा मंदिर में जा बसे हैं
पत्थर भी तपिश तेरी किस्मत पे हंस रहे हैं
बहुत उम्दा ग़ज़ल| दाद कबूल करें|
Comment by jagdishtapish on August 28, 2010 at 8:04pm
माननीया कंचन जी
तुने जिहें तराशा मंदिर में जा बसे हैं ---
हकीक़त को आपने नजदीक से समझा --
हम आपकी समझ को नमन करते है
साथ ही हार्दिक आभार भी ---सादर
Comment by Kanchan Pandey on August 28, 2010 at 5:48pm
तूने जिन्हें तराशा मंदिर में जा बसे हैं
पत्थर भी तपिश तेरी किस्मत पे हंस रहे हैं
bahut khub, achchi rachna
Comment by आशीष यादव on August 26, 2010 at 10:06pm
pranaam,
उठता हुआ जनाजा देखा वफ़ा का जिस दम
दुश्मन तो रोये लेकिन कुछ दोस्त हंस रहे हैं |
bahut sundar rachna mili padhne ke liye. bahut achchhi lagi.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 26, 2010 at 9:11pm
चाहत की धूप में जो कल सर के बल खड़े थे
मखमल की दूब पर भी अब पांव जल रहे हैं |
बहुत खूब, पुनः एक अच्छी रचना पठन करने को मिला, सुंदर और अर्थपूर्ण रचना, बधाई हो भाई साहब इस रचना के लिये,

कृपया ध्यान दे...

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