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ग़ज़ल...

पीले हुए हैं हाँथ जब से मेरे लाल  के,
आये समझ में भाव उसको आटे- दाल  के.
##
आना तू पूछने को जरा इंतजाम से,
दूंगा जवाब मै तुम्हारे हर सवाल के.
##
होते है ऐसे लोग भी अपने समाज में,
मारते हैं मखमली जूते निकाल  के.
##
हमको किसी सय्याद की बातों का डर नहीं,
पंछी चहकते हम सभी हैं एक डाल के.
##
कपड़ों के नाम चिन्दियाँ ,फैशन बनी यहाँ!
पहले भी पहनते थे लोग कपड़े  छाल के.
##
अविनाश बागडे.

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 12, 2012 at 6:10pm

शे’रों से उछल-उछल कर निकलते भाव आपकी संवेदना की गवाही दे रहे हैं.

बहुत खूब !

Comment by वीनस केसरी on February 11, 2012 at 10:50pm

अच्छा मतला कहा है
शेर भी अच्छे हुए हैं
हार्दिक बधाई
एक दो जगह शेर लय से भटक रहा है देख लीजिए

Comment by dilbag virk on February 3, 2012 at 9:17pm
कपड़ों के नाम चिन्दियाँ ,फैशन बनी यहाँ!
..................... ये भी कब तक हैं यही देखना है
बहुत खूब
सुंदर गजल
Comment by AVINASH S BAGDE on February 3, 2012 at 11:14am

aabhar Rjesh kumari ji.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 2, 2012 at 10:37pm

rochak ghazal.bahut khoob.

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