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बिखरे  हुए हैं गेसू इस इन्तजार में 

आये कोई झोंका  हवा का 
और संवार दे !
ढलका हुआ है आँचल 
नर्म  जमीं के बदन पर   
कि चांदनी भी 
तारों की लड़ियाँ निसार दे !
वो बैठे हैं गिराकर 
पलकों की झालरें 
चल के आये जवां ख़्वाब कोई 
और पहलू में जिंदगी गुजार दे !
ऐ काली घटाओ !
तिल सा काजल उधार दे दो 
जाए कोई मेरे महबूब की 
नजरें उतार दे !!

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 8, 2012 at 9:55am

abhar Raj Lally ji


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 8, 2012 at 9:55am

shukriya Saurabh ji


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 7, 2012 at 11:15pm

आह ! .. बहुत कोमल भाव ..  . तिल सा काजल.. . वाह !

 

Comment by राज लाली बटाला on February 7, 2012 at 10:16pm

जाए कोई मेरे महबूब की 

नजरें उतार दे !! khoob !

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 6, 2012 at 11:09am

Avinash ji hardik aabhar.

Comment by AVINASH S BAGDE on February 6, 2012 at 11:06am
वो बैठे हैं गिराकर 
पलकों कि झालरें 
चल के आये जवां ख़्वाब कोई 
और पहलू में जिंदगी गुजार दे !......बहुत खूब...Rajesh kumari ji.....dil chhoo liya. in dono bandho. ne.

ऐ काली घटाओं 
तिल सा काजल उधार देदो 
जाए कोई मेरे महबूब की 
नजरें उतार दे !!.......;खूबसूरत

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 5, 2012 at 4:38pm

hardik aabhar Seema ji.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 5, 2012 at 2:33pm

Aashutosh ji bahut bahut dhanyvaad.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 5, 2012 at 1:48pm

shukria Rajbundeli ji.

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on February 5, 2012 at 1:30pm

इस सुन्दर रचना हॆतु बधाई स्वीकार करिये,,,,,,,,,,,,,बहुत खूब,,,,,,,,,,,

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