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कंगूरों तक चढूंगा

सुनो राजन !

तुम्हे राजा बनाया है हमीं ने !

और अब हम ही खड़े है

हाथ बांधे

सर झुकाए

सामने अट्टालिकाओं के तुम्हारे !

जिस अटारी पर खड़े हो

सभ्यता की ,

तुम कथित आदर्श बनकर ,

जिन कंगूरों पर

तुम्हारे नाम का झंडा गड़ा है ,

उस महल की नींव देखो !

क्षत-विक्षत लाशें पड़ी है

हम निरीहों के अधूरे ख्वाहिशों की ,

और दीवारें बनी है

ईंट से हैवानियत की !

 

है तेरे संबोधनों में दब चुकी

चीत्कार सब कुचले हुओं की !

अट्टाहासों से तुम्हारे हार माने

सिसकियाँ ,

आहें सभी हारे हुओं की !

 

है भरे भंडार तेरी वासना के

भूख हम सब की तुम्हें दिखती नहीं है !

 

सिसकियाँ तुम सुन न पाए

अब मेरी हुंकार देखो ,

आँख से झरता हुआ अंगार देखो !

मैं उठा तो फिर कहाँ रोके रुकुंगा !

एक दिन मैं नींव का पत्थर

कंगूरों तक चढूंगा !!

 

 

 

........................................ अरुन श्री !

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Comment

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Comment by Arun Sri on March 2, 2012 at 8:23pm

उत्साहवर्धन के लिए आप सभी का ह्रदय से आभार ! धन्यवाद !

Comment by asha pandey ojha on February 25, 2012 at 11:09pm

है तेरे संबोधनों में दब चुकी

चीत्कार सब कुचले हुओं की !

अट्टाहासों से तुम्हारे हार माने

सिसकियाँ ,

आहें सभी हारे हुओं की !

  bahut umda rachna 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 25, 2012 at 4:54pm

//अब मेरी हुंकार देखो ,

आँख से झरता हुआ अंगार देखो !

मैं उठा तो फिर कहाँ रोके रुकुंगा !

एक दिन मैं नींव का पत्थर

कंगूरों तक चढूंगा//

अच्छी रचना, अरुण जी, बधाई हो |

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 25, 2012 at 3:47pm
समसामयिक और बहुत ही दमदार रचना है श्रीमान्!आपके हुंकार और जज्बे को सलाम करता हूं।आज भारत में इसी हुंकार की जरूरत है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2012 at 3:33pm

aaj ke nav yuavakon ko isi jajbe ki jaroorat hai.bahut prernadayak prastuti.

Comment by satish mapatpuri on February 25, 2012 at 2:42pm

सिसकियाँ तुम सुन न पाए

अब मेरी हुंकार देखो ,

आँख से झरता हुआ अंगार देखो !

मैं उठा तो फिर कहाँ रोके रुकुंगा !

एक दिन मैं नींव का पत्थर

कंगूरों तक चढूंगा !!

यही वो जज़्बा है , जिसने बड़े -बड़े परिवर्तन किये ............ सामयिक रचना ...... दाद कुबूल करें अरुण जी 

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