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फाग बड़ा चंचल करे, काया रचती रूप !
भाव-भावना-भेद को, फागुन-फागुन धूप !!

फगुनाई ऐसी चढ़ी,  टेसू धारें आग
दोहे तक तउआ रहे,  छेड़ें मन में फाग ॥

भइ, फागुन में उम्र भी करती जोरमजोर
फाग विदेही कर रहा, बासंती बरजोर !!

जबसे सींचित हो गये, बूँद-बूँद ले नेह ।
मन में फागुन झूमता, चैताती है देह !!

बोल हुए मनुहार से, जड़वत मन तस्वीर
मुग्धा होली खेलती, गुद-गुद हुआ अबीर ॥

धूप खिली छत खेलती, अल्हड़ खोले केश ।
इस फागुन फिर रह गये, बचपन के अवशेष ॥

करता नंग अनंग है, खुल्लमखुल्ले भाव
होश रहे तो नागरी,  जोशीले को ताव .. !

हम तो भाई देस के,  जिसके माने गाँव  ।
गलियाँ घर-घर जी रहीं - फगुआ, कुश्ती-दाँव ॥

****************
सौरभ 

 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 23, 2016 at 1:54pm

आदरणीया कान्ताजी, आपके अनुमोदन से फागुनी दोहे खिल उठे ! 

पुरानी रचनाओं से गुजरना स्वयं मेरे लिए भी उन जिये हुए क्षणों से गुजरना है.. आभार 

आपके साथ भाई अजीतेन्दु एवं आदरणीय सूर्या बाली को भी हार्दिक धन्यवाद कह रहा हूँ. 

Comment by kanta roy on February 23, 2016 at 11:40am
जबसे सींचित हो गये, बूँद-बूँद ले नेह ।
मन में फागुन झूमता, चैताती है देह !!
----- वाह ! फागुआ का रंग तो गजब का चढ़ा है यहाँ दोहे में । अद्वितीय छंद की प्रस्तुति हुई है आपके द्वारा आदरणीय सौरभ जी ,पढ़कर सच कहूँ तो मन अबीर हो आया है । ढेरों बधाई आपको ।
Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on May 16, 2012 at 2:46pm

सौरभ जी दोहों के माध्यम से आपने फागुन की खूबसूरती का मनभावन वर्णन किया है। बहुत अच्छा !!

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on May 5, 2012 at 8:25am

सौरभ जी सादर प्रणाम

आपकी रचना पढ़ के मन तो फिर फागुन में खो गया. बहुत बढ़िया...

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 16, 2012 at 10:08am

सादर धन्यवाद भ्रमरजी.

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 15, 2012 at 7:35pm

फगुनाई ऐसी चढ़ी,  टेसू धारें आग

दोहे तक तउआ रहे,  छेड़ें मन में फाग ॥

प्रिय  भ्राता श्री 

खूब बन पड़ी ये फाग की कहानी ..मन भावन ..तभी तो लोग कहते हैं की फागुन में बुढवू को भी चढ़ गयी ......दोहे भी   तउआ रहे ...
बधाई 
भ्रमर ५ 



भइ, फागुन में उम्र भी करती जोरमजोर

फाग विदेही कर रहा, बासंती बरजोर !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 15, 2012 at 10:17am

आदरणीय चातक जी, इन दोहों पर आपकी दृष्टि और आपका अनुमोदन मेरे लिये अत्यंत ही सुखकारी है. सहयोग बना रहे.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 15, 2012 at 10:15am

भाई राकेश जी,  सुर में सुर मिले और समां न बँधे ! आपने दोहों को अनुमोदित किया, हम आभारी हैं. सहयोग बना रहे.

हार्दिक धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 15, 2012 at 10:13am

आपकी नज़रेसानी मुझपे करम, आदरणीय योगराजभाईजी. क्या ताल दी है आपने. वाह ! अबके होली यादगार हो गयी.

Comment by Chaatak on March 14, 2012 at 10:55pm

स्नेही सौरभ जी, सादर अभिवादन, फागुन और फाग का ये खूबसूरत वर्णन दिल को छू गया |
अच्छे लेखन पर हार्दिक बधाई !

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